बिहार के दरभंगा ज़िले में स्थित नवादा भगवती स्थान (Hayhatt Devi Sthan, Nawada) मिथिला की अनोखी धार्मिक पहचान है। बेनीपुर के पास स्थित यह मंदिर अपनी प्राचीन परंपरा, अनोखी पूजा-पद्धति, पौराणिक मान्यताओं और रहस्यमयी इतिहास के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। पूरे मिथिला और नेपाल तक से श्रद्धालु यहाँ देवी का आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं। खास बात यह कि यहाँ देवी की मूर्ति नहीं, बल्कि सिंहासन (Throne) की पूजा की जाती है। इसी कारण यह स्थान भारत के सबसे अनूठे शक्ति-स्थलों में से एक माना जाता है।
नवादा गाँव, बिहार के दरभंगा ज़िले में बेनीपुर प्रखंड के अंतर्गत आता है। यह बेनीपुर बाज़ार से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मिथिला के सांस्कृतिक क्षेत्र में बसे इस गाँव की पहचान आज पूरे राज्य में इसके प्रसिद्ध शक्तिपीठ — नवादा भगवती स्थान — के कारण है।
गाँव की जनसंख्या लगभग 8,000 के आसपास (जनगणना 2011) है और क्षेत्रफल लगभग 708 हेक्टेयर में फैला है। गाँव की पवित्रता और धार्मिक वातावरण इसे धर्मप्रेमियों और पर्यटकों के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र बनाता है।
नवादा भारत के उन दुर्लभ स्थलों में है जहाँ देवी की प्रतिमा नहीं, बल्कि सिंहासन की पूजा की जाती है। यह इसे बेहद विशिष्ट बनाता है। आइए इसके अन्य कारण भी समझते हैं:
नवादा भगवती स्थान को भारत के 52 सिद्ध पीठों में से एक माना जाता है। लोकमान्यता है कि यहीं देवी सती का वाम-स्कंध (कंधा) गिरा था। इस कारण यहाँ देवी की शक्ति विशेष रूप से विद्यमान मानी जाती है।
इस मंदिर में देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। उनकी उपस्थिति सिंहासन में मानी जाती है। यह प्रथा न केवल मिथिला बल्कि पूरे भारत में बेहद अनोखी है। श्रद्धालु मानते हैं कि देवी अदृश्य रूप से इस सिंहासन पर विराजमान रहती हैं।
नवादा गाँव में दीपावली एक दिन पहले मनाई जाती है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और यह माना जाता है कि पहले यहाँ दीया जलाने से पूरे क्षेत्र में सुख-समृद्धि आती है। यह परंपरा आसपास के गाँवों में भी प्रतिष्ठित है।
नवरात्रि के समय हजारों श्रद्धालु यहाँ पहुंचते हैं। नवमी के अवसर पर विशेष पूजन, दुर्गा आराधना, श्रृंगार और भव्य सभाएँ आयोजित की जाती हैं।
नवादा भगवती स्थान “शक्ति-साधना” का प्रमुख केंद्र है। तांत्रिक परंपरा में इसका विशेष महत्व है और यहाँ साधक अपनी साधना के लिए आते हैं।
नवादा का इतिहास पौराणिक काल से जुड़ा हुआ है। विभिन्न पुराणों और लोक-कथाओं में इस स्थल का वर्णन मिलता है।
शिव-सती कथा के अनुसार, जब भगवान शिव सती के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को पृथ्वी पर गिराया। नवादा में उनका बायाँ कंधा गिरा था, इसलिए यहाँ शक्ति जागृत हुई।
स्थानीय मान्यता है कि सदियों पहले मिथिला के राजा हयहट्ट ने यहाँ देवी की स्थापना करवाई थी, इसी कारण देवी का नाम “हयहट्ट देवी” पड़ा।
एक प्रचलित कथा के अनुसार, हावीडीह गाँव के एक भक्त को देवी ने सपना देकर कहा था कि उन्हें किसी विशेष स्थान पर स्थापित करें। बाद में देवी का सिंहासन नवादा में स्थापित हुआ और तब से प्रतिमा नहीं, केवल सिंहासन की पूजा की जाती है।
यह मंदिर भारत के कुछ अत्यंत दुर्लभ स्थलों में से है जहाँ देवी को बिना मूर्ति के, केवल सिंहासन के माध्यम से पूजा जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि सिंहासन देवी की शक्ति का केंद्र है।
सिंहासन को कान के आकार जैसा कहा जाता है, और इसे विशेष प्रकार के लाल वस्त्र से ढंका जाता है। यहाँ रोजाना सुगंधित पुष्प, फल, प्रसाद, और विशेष श्रृंगार किया जाता है।
नवरात्रि की अष्टमी और नवमी को यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। इस समय मंदिर में घंटों लाइन लगती है।
मिथिला के राजाओं और स्थानीय नवाबों ने समय-समय पर इस मंदिर को दान, श्रंगार सामग्री और भूमि प्रदान की थी, जिससे इसकी महिमा बढ़ी।
बेनीपुर से नवादा की दूरी मात्र 5 किमी है, इसलिए बेनीपुर क्षेत्र के लोग नवादा भगवती स्थान के प्रमुख श्रद्धालु माने जाते हैं। बेनीपुर बाजार, अस्पताल, स्कूल और सुविधाओं की उपलब्धता नवादा को और महत्वपूर्ण बनाती है।
इस समय पूरे नवादा में उत्सव जैसा माहौल रहता है। मंदिर में कलश स्थापना, हवन, कन्या पूजन, और देवी आरती के विशेष कार्यक्रम होते हैं।
यह परंपरा नवादा का अनूठा सांस्कृतिक चिह्न है। माना जाता है कि देवी को पहले दीप चढ़ाए जाते हैं, उसी से पूरे क्षेत्र में प्रकाश और समृद्धि फैली रहती है।
लोग यहाँ संतान प्राप्ति, रोग-निवारण, विवाह, सफलता तथा जीवन-सुख के लिए मनोकामना मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु नारियल, चुनरी, प्रसाद या दीप दान करते हैं।
हालाँकि धार्मिक और लोकपरंपरा में नवादा का मजबूत इतिहास है, लेकिन पुरातत्व की दृष्टि से अभी यहाँ:
कोई प्रमुख एएसआई द्वारा उत्खनन
प्राचीन शिलालेख
शास्त्रीय अभिलेख
या विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन
उपलब्ध नहीं है। यह नवादा भगवती स्थान को भविष्य के शोध-कार्यों के लिए एक संभावित केंद्र बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहाँ पुरातात्विक खुदाई की जाए, तो संभव है कि प्राचीन मिथिला सभ्यता से जुड़े महत्वपूर्ण अवशेष मिल सकें।
आज नवादा भगवती स्थान मिथिला के सबसे अधिक देखे जाने वाले शक्ति-स्थलों में से एक है। यहाँ आने वाले भक्तों के लिए:
मंदिर परिसर
स्थानीय बाजार
भोग-प्रसाद की दुकानें
दीप-दान व्यवस्था
धार्मिक सभाएँ
सभी व्यवस्था से युक्त हैं। प्रशासन द्वारा नवरात्रि के समय विशेष सुरक्षा और साफ-सफाई की व्यवस्था भी की जाती है।
नवादा भगवती स्थान केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मिथिला की धार्मिक आत्मा का प्रतीक है। इसका सिद्ध पीठ होना, पौराणिक महत्व, मूर्ति-विहीन पूजा-पद्धति, दीपावली की विशेष परंपरा और नवरात्रि की भव्यता इसे अत्यंत विशिष्ट बनाते हैं। नवादा का इतिहास, संस्कृति और आस्था इसे मिथिला के आध्यात्मिक मानचित्र में सर्वोच्च स्थान देते हैं।
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