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क्या हम आखिरी पीढ़ी हैं जो शुद्ध मैथिली बोलेंगे? घर-घर बदल रही भाषा की पूरी कहानी

मैथिली भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि मिथिला की पहचान, परिवार की स्मृति और पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति की आवाज है। लेकिन आज एक सवाल पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है—क्या आने वाली पीढ़ी भी मैथिली को उसी सहजता से बोल पाएगी, जिस तरह हमारे दादा-दादी और माता-पिता बोलते आए हैं?

क्या हम आखिरी पीढ़ी हैं जो शुद्ध मैथिली बोलेंगे? घर-घर बदल रही भाषा की पूरी कहानी

कभी-कभी किसी भाषा के खत्म होने की शुरुआत कोई बड़ी घोषणा करके नहीं होती। कोई अखबार यह खबर नहीं छापता कि आज से भाषा कमजोर हो गई। कोई घंटी नहीं बजती। बस धीरे-धीरे घर में उसके शब्द कम होने लगते हैं।

पहले दादी पोता-पोती से मैथिली में बात करती हैं। फिर बच्चे जवाब हिंदी में देने लगते हैं। कुछ साल बाद माता-पिता भी बच्चों से हिंदी या हिंदी-मिश्रित भाषा में बात करने लगते हैं। गाँव से शहर जाने के बाद बातचीत में अंग्रेजी के शब्द भी जुड़ जाते हैं। और एक दिन वही बच्चा अपनी ही मातृभाषा को समझ तो लेता है, लेकिन सहज होकर बोल नहीं पाता।

यहीं से एक सवाल जन्म लेता है—

क्या हम वह आखिरी पीढ़ी बन रहे हैं जो शुद्ध मैथिली बोलना जानती है?

यह सवाल केवल भाषा का सवाल नहीं है। यह हमारी पहचान, हमारे घर, हमारे गाँव, हमारे लोकगीत, हमारी कहानियों और उन बुजुर्गों की आवाज का सवाल है जिनसे हमने पहली बार दुनिया को समझना सीखा।

मैथिली भारत की मान्यता प्राप्त भाषाओं में शामिल है और भारत की जनगणना के मातृभाषा आँकड़ों में भी मैथिली को अलग भाषा के रूप में दर्ज किया गया है। यानी समस्या यह नहीं है कि मैथिली का अस्तित्व खत्म हो गया है। असली सवाल यह है कि मैथिली आने वाली पीढ़ी के रोजमर्रा के जीवन में कितनी मजबूती से बनी रहेगी।

बात सिर्फ “शुद्ध मैथिली” की क्यों नहीं है?

जब हम कहते हैं कि आज की पीढ़ी शुद्ध मैथिली नहीं बोलती, तो हमें थोड़ा रुककर सोचना चाहिए।

भाषा कोई पत्थर की लकीर नहीं होती।

हर भाषा समय के साथ बदलती है। नए शब्द आते हैं, पुराने शब्द कम होते हैं, दूसरी भाषाओं के शब्द जुड़ते हैं। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है।

इसलिए मैथिली में हिंदी या अंग्रेजी के कुछ शब्द आ जाने भर से भाषा खत्म नहीं हो जाती।

असल चिंता तब शुरू होती है जब बच्चा मैथिली में पूरा विचार व्यक्त करना ही भूलने लगे।

उसे दादी की बात समझ आती है, लेकिन वह जवाब हिंदी में देता है।

उसे मैथिली गीत पसंद है, लेकिन गीत का अर्थ पूछना पड़ता है।

वह मिथिला के त्योहार मनाता है, लेकिन उस त्योहार से जुड़ी लोककथा अपनी भाषा में नहीं सुना पाता।

यानी भाषा सुनाई तो दे रही है, लेकिन धीरे-धीरे जीने की भाषा से सिर्फ सुनने की भाषा बनती जा रही है।

और यही फर्क सबसे महत्वपूर्ण है।

 


हमारे घर में पहला बदलाव कहाँ आया?

अगर ईमानदारी से देखें तो भाषा बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसी सरकार, संस्था या स्कूल से पहले घर की है।

बच्चा पहली भाषा किताब से नहीं सीखता।

वह माँ की आवाज से सीखता है।

दादी की कहानी से सीखता है।

पिता की डाँट से सीखता है।

नाना-नानी के मजाक से सीखता है।

आँगन में दूसरे बच्चों के साथ खेलते हुए सीखता है।

यही कारण है कि किसी भाषा का भविष्य स्कूल की किताब से ज्यादा उसके घर की बातचीत में दिखाई देता है।

पहले मिथिला के बहुत से घरों में बच्चे सुबह से रात तक मैथिली सुनते थे। घर की छोटी-बड़ी बातचीत, खेत का काम, बाजार की चर्चा, रिश्तेदारों से बातचीत, शादी-ब्याह की तैयारी—सबमें मैथिली स्वाभाविक रूप से मौजूद रहती थी।

आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं।

परिवार छोटे हो गए।

लोग नौकरी के लिए शहरों में चले गए।

बच्चे अलग-अलग राज्यों में पढ़ने लगे।

घर में टीवी और मोबाइल की भाषा बदल गई।

बच्चे YouTube पर दूसरी भाषाओं का कंटेंट देखने लगे।

और धीरे-धीरे घर की बातचीत भी बदलने लगी।

यही बदलाव सबसे ज्यादा ध्यान देने लायक है।


शहर ने मैथिली को दूर किया या मोबाइल ने?

यह सवाल भी आसान नहीं है।

अक्सर हम कहते हैं कि शहर में रहने के कारण बच्चे मैथिली भूल रहे हैं।

लेकिन क्या सच में सिर्फ शहर जिम्मेदार है?

आज मोबाइल ने भाषा की दुनिया पूरी तरह बदल दी है।

एक बच्चा सुबह उठने के बाद परिवार से दस मिनट बात करता है, लेकिन मोबाइल पर घंटों ऐसी भाषा सुनता है जो उसके घर की भाषा नहीं है।

वह हिंदी वीडियो देखता है।

अंग्रेजी गेम खेलता है।

हिंदी गाने सुनता है।

हिंदी में कॉमेडी देखता है।

और कई बार मैथिली कंटेंट उसके सामने आता ही नहीं।

फिर उससे यह उम्मीद करना कि वह मैथिली में उसी सहजता से बोलेगा, शायद ठीक नहीं होगा।

लेकिन यहाँ एक अच्छी बात भी है।

यही मोबाइल मैथिली को कमजोर करने के बजाय मजबूत भी कर सकता है।

आज पहली बार ऐसा समय आया है जब मिथिला का कोई युवा अपने गाँव से बैठकर पूरी दुनिया तक मैथिली में पहुँच सकता है।

YouTube पर मैथिली गीत।

Facebook पर मैथिली वीडियो।

Instagram पर मैथिली Reels।

Website पर मैथिली कहानी।

Podcast में मैथिली बातचीत।

अगर इंटरनेट मैथिली के खिलाफ चुनौती है, तो वही इंटरनेट मैथिली के लिए सबसे बड़ा अवसर भी है।


क्या मैथिली सिर्फ बुजुर्गों की भाषा बन जाएगी?

यह सबसे डराने वाला सवाल है।

अगर किसी भाषा को बोलने वाले ज्यादातर लोग बुजुर्ग हों और बच्चे उसे सिर्फ समझें, बोलें नहीं, तो भविष्य को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है।

लेकिन मैथिली के मामले में तस्वीर इतनी सीधी नहीं है।

आज भी बड़ी संख्या में लोग मैथिली को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज करते हैं। भारत की 2011 की जनगणना में मैथिली के लिए अलग मातृभाषा श्रेणी मौजूद है और Census India के भाषा आँकड़ों में इसके वितरण को दर्ज किया गया है।

साथ ही मैथिली का साहित्यिक इतिहास भी मजबूत है। साहित्य अकादमी के प्रकाशनों में मैथिली साहित्य के इतिहास और आधुनिक मैथिली साहित्य पर अलग पुस्तकें सूचीबद्ध हैं।

इसका मतलब है कि हमारे पास भाषा की जड़ें भी हैं और साहित्य की बड़ी परंपरा भी।

अब सवाल है—

क्या हम इस विरासत को रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करेंगे?

क्योंकि किताब में बची भाषा और घर में बोली जाने वाली भाषा में बहुत फर्क होता है।


“बच्चा मैथिली बोलेगा तो पीछे रह जाएगा”—यह सोच कहाँ से आई?

यह बात शायद सबसे ज्यादा गंभीरता से समझने की जरूरत है।

कई माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा हिंदी और अंग्रेजी अच्छी तरह सीखे।

यह बिल्कुल सही इच्छा है।

लेकिन समस्या तब होती है जब माता-पिता यह मान लेते हैं कि मैथिली बोलने से बच्चा हिंदी या अंग्रेजी में कमजोर हो जाएगा।

एक बच्चे का एक से अधिक भाषाएँ सीखना अपने आप में समस्या नहीं है।

बल्कि बच्चे के सामने कई भाषाओं का वातावरण हो तो वह अलग-अलग संदर्भों में अलग भाषाओं का इस्तेमाल करना सीख सकता है।

इसलिए रास्ता यह नहीं है कि बच्चे को मैथिली सिखाने के लिए हिंदी या अंग्रेजी छोड़ दी जाए।

रास्ता यह है कि—

हिंदी भी रहे, अंग्रेजी भी रहे और मैथिली भी रहे।

बच्चा स्कूल में हिंदी पढ़े।

जरूरत के अनुसार अंग्रेजी सीखे।

लेकिन घर में दादी से मैथिली में बात करे।

माँ से मैथिली सुने।

गाँव जाए तो मैथिली बोले।

त्योहार के गीत मैथिली में सुने।

लोककथा मैथिली में सुने।

यही संतुलन भाषा को जीवित रख सकता है।


सबसे ज्यादा खतरा किसे है—शब्दों को या भावों को?

कई बार हम भाषा बचाने के नाम पर सिर्फ कठिन और पुराने शब्दों की सूची बनाने लगते हैं।

पुराने शब्द महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन भाषा केवल शब्दकोश नहीं है।

भाषा में भाव भी होते हैं।

मान लीजिए कोई माँ अपने बच्चे को मैथिली में पुकारती है।

उस एक पुकार में जो अपनापन है, वह सिर्फ शब्द का अर्थ नहीं है।

दादी जब बचपन की कहानी मैथिली में सुनाती हैं, तो बच्चे को केवल कहानी नहीं मिलती।

उसे परिवार का इतिहास मिलता है।

जब शादी में मैथिली गीत गाया जाता है, तो उसमें सिर्फ संगीत नहीं होता।

उसमें पीढ़ियों की स्मृति होती है।

जब कोई परदेश में बैठा व्यक्ति अपने गाँव के किसी बुजुर्ग से मैथिली में बात करता है, तो उसे सिर्फ भाषा नहीं सुनाई देती।

उसे अपना घर सुनाई देता है।

यही मैथिली की सबसे बड़ी ताकत है।


मैथिली के पुराने शब्द क्यों बचाने चाहिए?

हमारे गाँवों में ऐसे बहुत से शब्द हैं जिन्हें आज की पीढ़ी कम सुनती है।

कुछ शब्द खेती से जुड़े हैं।

कुछ रिश्तों से।

कुछ घरेलू काम से।

कुछ मौसम से।

कुछ स्थानीय खान-पान से।

कुछ ऐसे हैं जिनका सही अर्थ समझाने के लिए पूरा प्रसंग बताना पड़ता है।

अगर ये शब्द बातचीत से निकलते गए, तो कुछ दशकों बाद बच्चे इन्हें केवल पुराने गीतों या किताबों में देखेंगे।

इसलिए हर परिवार एक छोटा सा काम कर सकता है।

दादा-दादी से पुराने मैथिली शब्द पूछिए।

उनका अर्थ लिखिए।

मोबाइल में रिकॉर्ड कीजिए।

उस शब्द से जुड़ी कहानी पूछिए।

फिर उसे बच्चों को बताइए।

आपको शायद लगेगा कि यह बहुत छोटा काम है।

लेकिन भाषा इसी तरह बचती है।

बड़े भाषणों से नहीं।

रोजमर्रा की छोटी आदतों से।


क्या सोशल मीडिया मैथिली को बचा सकता है?

हाँ—लेकिन तभी जब हम सिर्फ दूसरी भाषाओं के कंटेंट की नकल न करें।

मैथिली में अपना कंटेंट बनाना होगा।

मैथिली में छोटी कहानी।

मैथिली में गाँव का वर्णन।

मैथिली में लोकगीत।

मैथिली में इतिहास।

मैथिली में खाना।

मैथिली में त्योहार।

मैथिली में गाँव के बुजुर्गों की बातचीत।

मैथिली में बच्चों के लिए कहानी।

और सबसे जरूरी—

मैथिली में रोजमर्रा की जिंदगी।

क्योंकि अगर मैथिली इंटरनेट पर सिर्फ पर्व और पूजा के समय दिखाई देगी, तो नई पीढ़ी उसे केवल “त्योहार की भाषा” समझ सकती है।

हमें उसे जिंदगी की भाषा भी बनाना होगा।


एक मैथिली वेबसाइट क्या कर सकती है?

एक वेबसाइट केवल लेख प्रकाशित करने की जगह नहीं है।

यह भाषा का डिजिटल घर बन सकती है।

मान लीजिए कोई युवा Google पर खोजता है—

“मैथिली में पुराने शब्द”

“मिथिला की परंपरा”

“मैथिली लोकगीत”

“मिथिला के गाँव”

“मिथिला का खान-पान”

“मैथिली विवाह”

अगर उसे अच्छी सामग्री अपनी भाषा और अपनी संस्कृति के बारे में मिलती है, तो वह केवल एक लेख नहीं पढ़ेगा।

वह अगला लेख भी पढ़ सकता है।

फिर तीसरा।

और धीरे-धीरे वेबसाइट एक डिजिटल संग्रह बन सकती है।

इसीलिए मैथिली वेबसाइट पर सिर्फ त्योहार की तारीखें डालने के बजाय कहानियाँ, अनुभव, शब्द, लोकपरंपरा, गाँव और लोगों की आवाज भी दर्ज करनी चाहिए।

यही वह सामग्री है जो वर्षों बाद भी उपयोगी रहेगी।


हमारी भाषा बचाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है।

लेकिन असली बदलाव छोटी आदतों से आएगा।

1. घर में रोज कुछ समय मैथिली बोलें

पूरा दिन संभव न हो तो कोई बात नहीं।

रोज 20–30 मिनट परिवार में केवल मैथिली में बातचीत शुरू की जा सकती है।

2. बच्चों से मैथिली में बात करें

बच्चा हिंदी में जवाब दे तो भी आप मैथिली में जवाब दे सकते हैं।

धीरे-धीरे उसे भाषा स्वाभाविक लगेगी।

3. दादा-दादी की आवाज रिकॉर्ड करें

उनसे गाँव की पुरानी कहानी, विवाह की परंपरा, खेती, लोकगीत और पुराने शब्द पूछिए।

यह आने वाली पीढ़ी के लिए अनमोल रिकॉर्ड होगा।

4. मैथिली कंटेंट बनाइए

आपके पास मोबाइल है तो आप creator हैं।

एक मिनट का वीडियो भी भाषा के लिए काम कर सकता है।

5. बच्चों के लिए मैथिली सामग्री बनाइए

अगर बच्चों को मैथिली में मजेदार कहानी, animation, rhyme, quiz और short video मिलेंगे, तो भाषा उन्हें बोझ नहीं लगेगी।

6. मैथिली को केवल “पुरानी भाषा” मत बनाइए

मैथिली में आज की बात भी होनी चाहिए।

Technology की बात।

Job की बात।

Education की बात।

Love की बात।

Comedy की बात।

Village life की बात।

यानी जो जीवन आज हम जी रहे हैं, उसकी भाषा भी मैथिली हो।


क्या “शुद्ध मैथिली” बच सकती है?

शायद इस सवाल का जवाब “हाँ” या “नहीं” में देना सही नहीं होगा।

क्योंकि कोई भी भाषा बिल्कुल स्थिर नहीं रहती।

आज की मैथिली भी वैसी नहीं है जैसी सौ साल पहले थी।

आने वाले पचास साल की मैथिली भी आज जैसी नहीं होगी।

कुछ नए शब्द आएँगे।

कुछ पुराने शब्द कम होंगे।

बोलने का तरीका बदलेगा।

लिखने का तरीका बदलेगा।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भाषा खत्म हो जाएगी।

असल लक्ष्य भाषा को संग्रहालय में सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उसे जीवन में जीवित रखना होना चाहिए।

अगर नई पीढ़ी मैथिली में हँसती है।

मैथिली में प्रेम करती है।

मैथिली में मजाक करती है।

मैथिली में कहानी सुनती है।

मैथिली में अपने दुख की बात करती है।

मैथिली में गीत बनाती है।

तो मैथिली जीवित है।

भले ही उसकी भाषा समय के साथ थोड़ी बदल जाए।


एक दिन ऐसा भी हो सकता है…

कल्पना कीजिए।

साल 2050 है।

एक बच्चा अपने दादा से पूछता है—

“दादाजी, आप कौन सी भाषा बोलते थे?”

दादा कहते हैं—

“हम मैथिली बोलैत छलहुँ।”

बच्चा पूछता है—

“मैथिली क्या होती है?”

अगर हमें यह सवाल सुनना पड़ा, तो शायद हमें आज से ही सोचना चाहिए।

लेकिन दूसरी तस्वीर भी संभव है।

साल 2050 में वही बच्चा अपने दादा से कहता है—

“दादाजी, अहाँ हमरा ओ पुरान कथा फेर सँ सुनाउ।”

और दादा मुस्कुराकर मैथिली में कहानी शुरू कर देते हैं।

फर्क केवल इतना है कि हमने आज क्या चुना।


मैथिली बचाने का सबसे आसान तरीका क्या है?

इसके लिए किसी बड़े अभियान की जरूरत नहीं है।

आज घर में एक वाक्य मैथिली में बोलिए।

कल दो वाक्य।

बच्चे से एक सवाल मैथिली में पूछिए।

दादी की एक कहानी रिकॉर्ड कीजिए।

एक पुराना शब्द लिखिए।

एक मैथिली गीत सुनिए।

एक मैथिली वीडियो साझा कीजिए।

एक मैथिली लेख पढ़िए।

एक मैथिली लेखक की किताब खरीदिए।

इतना छोटा काम भी बहुत बड़ा हो सकता है।

क्योंकि भाषा किसी संस्था की संपत्ति नहीं होती।

भाषा उसके बोलने वालों की साँस में रहती है।


मैथिली सिर्फ भाषा नहीं, घर लौटने का रास्ता है

हममें से बहुत लोग मिथिला से दूर रहते हैं।

दिल्ली में।

मुंबई में।

सूरत में।

कोलकाता में।

नेपाल में।

विदेशों में।

हमारे आसपास की भाषा बदल जाती है।

हमारी नौकरी बदल जाती है।

हमारा पता बदल जाता है।

हमारी दिनचर्या बदल जाती है।

लेकिन जब अचानक कोई अपनेपन से मैथिली में पूछ देता है—

“केहन छी?”

तो कुछ पल के लिए दूरी खत्म हो जाती है।

यही किसी मातृभाषा की ताकत है।

वह आपको सिर्फ शब्द नहीं देती।

वह आपको पहचान देती है।


अब फैसला हमारी पीढ़ी को करना है

इस लेख का सबसे जरूरी सवाल शायद यह नहीं है कि—

“क्या हम आखिरी पीढ़ी हैं जो शुद्ध मैथिली बोलेंगे?”

असल सवाल यह है—

“क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को मैथिली बोलने का मौका देंगे?”

अगर जवाब हाँ है, तो अभी बहुत देर नहीं हुई है।

बच्चे को मैथिली सिखाने के लिए किसी विशेष स्कूल की जरूरत नहीं।

पहला स्कूल घर है।

पहली किताब परिवार है।

पहला शिक्षक माँ है।

पहली कहानी दादी है।

पहला शब्द वही है जो बच्चा घर में सुनता है।

इसलिए अगर हम चाहते हैं कि मैथिली आने वाली पीढ़ी तक पहुँचे, तो शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं—

अपने घर से करनी होगी।

आज से।

अभी से।

एक छोटे से वाक्य से।

एक कहानी से।

एक गीत से।

एक बातचीत से।

क्योंकि जब तक मैथिली घर में बोली जाती रहेगी, तब तक मिथिला की आवाज भी बोलती रहेगी।

और शायद तब हमें अपने बच्चों से यह नहीं पूछना पड़ेगा—

“क्या तुम मैथिली समझते हो?”

बल्कि वे खुद कहेंगे—

“हँ, ई हमर भाषा अछि।”


3 काम जो आज से शुरू किए जा सकते हैं

पहला काम: घर के बुजुर्ग से 10 पुराने मैथिली शब्द पूछकर लिखें।

दूसरा काम: सप्ताह में कम-से-कम एक दिन परिवार में बच्चों से मैथिली में बातचीत करें।

तीसरा काम: एक पुरानी मैथिली कहानी, लोकगीत या पारिवारिक परंपरा को रिकॉर्ड करके डिजिटल रूप में सुरक्षित करें।

ये तीन छोटे कदम किसी अभियान से कम नहीं हैं।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या मैथिली भाषा खत्म होने वाली है?

ऐसा कहना सही नहीं होगा। मैथिली आज भी बड़ी संख्या में लोगों द्वारा बोली जाती है और भारत की जनगणना में इसकी अलग मातृभाषा श्रेणी दर्ज है। चिंता मुख्य रूप से इसके भविष्य के रोजमर्रा के इस्तेमाल और नई पीढ़ी के भाषा-हस्तांतरण को लेकर है।

क्या हिंदी और अंग्रेजी सीखने से मैथिली कमजोर हो जाएगी?

जरूरी नहीं। बच्चे कई भाषाएँ सीख सकते हैं। चुनौती तब आती है जब घर में मैथिली का इस्तेमाल ही बंद हो जाता है।

बच्चों को मैथिली कैसे सिखाएँ?

सबसे आसान तरीका है उनसे रोजमर्रा की छोटी बातचीत मैथिली में करना, लोककथा और गीत सुनाना तथा घर के बुजुर्गों से बातचीत का अवसर देना।

क्या मैथिली में Content बनाना जरूरी है?

आज के डिजिटल समय में यह बहुत उपयोगी हो सकता है। अगर मैथिली में शिक्षा, मनोरंजन, कहानी, इतिहास, संस्कृति और आधुनिक जीवन से जुड़ी सामग्री बढ़ती है, तो नई पीढ़ी को भाषा डिजिटल दुनिया में भी दिखाई देगी।

क्या शुद्ध मैथिली ही बचानी जरूरी है?

भाषा को बिल्कुल स्थिर रखना संभव नहीं होता। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि मैथिली नई पीढ़ी के जीवन में इस्तेमाल होती रहे। समय के साथ शब्द और बोलने का तरीका बदल सकते हैं, लेकिन भाषा की जीवंतता बनी रहनी चाहिए।


निष्कर्ष

मैथिली का भविष्य केवल किताबों, साहित्यिक संस्थाओं या सरकारी मान्यता से तय नहीं होगा।

उसका भविष्य हमारे घर तय करेंगे।

हम अपने बच्चों से किस भाषा में बात करते हैं।

दादी की कहानी किस भाषा में सुनाई जाती है।

हम अपने त्योहारों के गीत किस भाषा में गाते हैं।

हम इंटरनेट पर किस भाषा में लिखते और बोलते हैं।

और सबसे बड़ी बात—

हम अपनी भाषा को लेकर शर्म महसूस करते हैं या गर्व।

अगर मैथिली घर में रहेगी, तो वह बाजार में भी रहेगी।

अगर मैथिली बच्चों की बातचीत में रहेगी, तो इंटरनेट पर भी रहेगी।

अगर मैथिली में नई कहानियाँ लिखी जाएँगी, तो उसका भविष्य भी लिखा जाएगा।

इसलिए शायद हम आखिरी पीढ़ी नहीं हैं।

शायद हम वह पीढ़ी हैं जिसके हाथ में यह फैसला है कि मैथिली हमारे बाद भी उसी अपनापन के साथ बोली जाएगी या नहीं।

और इस फैसले की शुरुआत बहुत छोटी है—

आज अपने घर में मैथिली बोलिए।

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Jai Mithila

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