बुजुर्गक मुँह सँ निकलल एकटा शब्द, अगिला पीढ़ी लेल पूरा इतिहास भऽ सकैत अछि।
कहियो अहाँ अपन घरक बुजुर्ग सँ एहन कोनो शब्द सुनने छी जे सुनिते बुझना कठिन भऽ गेल हो? दादा-दादी या नाना-नानी कहैत छथि, लेकिन बच्चा बीच में पूछ दैत अछि—“ई शब्दक मतलब की होइत अछि?”
यही ठाम सँ भाषा के बदलैत रूप दिखाई पड़ैत अछि।
भाषा अचानक खत्म नहि होइत अछि। भाषा धीरे-धीरे बदलैत अछि। पहिने कोनो शब्द कम सुनाइत अछि, फेर घर में ओकर जगह दोसर आसान शब्द लऽ लैत अछि, फेर बच्चा ओकर अर्थ पूछैत अछि, आ आखिर में एक दिन ओ शब्द केवल पुरान लोकक याद में बचि जाइत अछि।
मिथिला में सेहो ई बदलाव चलि रहल अछि।
आजक बच्चा मोबाइल, स्कूल, टीवी, YouTube, Instagram आ शहरक भाषा सँ बहुत जल्दी प्रभावित भऽ रहल अछि। ओकर दैनिक बातचीत में बहुत शब्द हिंदी या अंग्रेजी सँ आबि रहल अछि। ई बदलाव अपने में गलत नहि अछि। हर जीवित भाषा समयक संग बदलैत अछि।
मुदा चिंता तखन होइत अछि, जखन भाषा बदलैत-बदलैत ओकर अपन घरक शब्द पीछे छूटि जाए।
किएक तँ एकटा शब्द केवल शब्द नहि होइत अछि।
ओकर भीतर एकटा काम होइत अछि।
एकटा वस्तु होइत अछि।
एकटा मौसम होइत अछि।
एकटा खेती होइत अछि।
एकटा रिश्ता होइत अछि।
कहियो-कहियो पूरा गाँवक जीवन छुपल होइत अछि।
एहि article में हम एहन 10 शब्दक बात करब, जिनका पीछे मिथिलाक लोकजीवनक एकटा पूरा कहानी अछि।
आ सबसे जरूरी बात—ई शब्द केवल dictionary में राखबाक चीज नहि छथि। अगर घर में फेर सँ बोलल जाए, तऽ ई शब्द आजो जिन्दा भऽ सकैत छथि।
कतेको लोक सोचैत छथि जे भाषा किताब में बचैत अछि।
किताब जरूरी अछि, लेकिन भाषा के सबसे पैघ घर किताब नहि—घर आ परिवार अछि।
बच्चा जखन अपन माय सँ पहिल बेर कोनो शब्द सुनैत अछि, ओहि समय भाषा ओकर जीवन में प्रवेश करैत अछि।
दादी जखन पुरान कहानी सुनबैत छथि, भाषा अगिला पीढ़ी तक पहुँचैत अछि।
खेत में काम करैत किसान जखन खेतीक स्थानीय शब्द बोलैत छथि, भाषा जमीन सँ जुड़ल रहैत अछि।
मछली पकड़य वाला, बाँसक सामान बनाबय वाला, माटिक बर्तन बनाबय वाला, खेत में आमक बगान देखनिहार—सभ अपन-अपन शब्दक संसार लऽ कऽ चलैत छथि।
एहि कारण सँ मैथिली शब्दावली के इतिहास केवल साहित्य में नहि, मिथिलाक रोजमर्रा के जीवन में सेहो भेटैत अछि।
मैथिली भाषा पर शब्दकोशीय काम बहुत पुरान अछि। एक आधुनिक सरकारी Hindi-Maithili शब्दकोश के प्रस्तावना में शब्दकोश के भाषा के विचार, भावना आ अनुभवक संप्रेषण लेल जरूरी साधन कहल गेल अछि। ओहि स्रोत में मैथिली शब्द-संपदा के क्षेत्रीय आ आंचलिक विविधता पर सेहो ध्यान देल गेल अछि।
मोमी।
आजक बच्चा के ई शब्द सुनाबैत पूछू—“मोमी की होइत अछि?”
बहुत संभव अछि कि ओकरा ई शब्द सँ कोनो वस्तु याद नहि आबय।
मिथिलाक ग्रामीण जीवन में बाँस केवल पेड़ नहि छल। बाँस सँ घरक अनेक जरूरी सामान बनैत छल। टोकरी, डलिया, सामान रखबाक पात्र, खेतक काम में उपयोग होय वाला चीज—बाँस ग्रामीण अर्थव्यवस्थाक महत्वपूर्ण हिस्सा रहल अछि।
एक संसदीय वक्तव्य में मैथिली लोकभाषा के उदाहरण देइत बाँसक सामानक अलग-अलग आकार के लेल अलग शब्द गिनाओल गेल छल, जाहि में सबसे छोट आकार के लेल मोमी शब्दक उल्लेख अछि।
सोचू, एकटा साधारण टोकरी लेल सेहो अलग-अलग आकारक नाम छल।
आज हम शायद कहि देब—
“एकटा basket दियौ।”
बस।
मुदा पुरान भाषा कहैत छल—ई आकारक अलग चीज अछि, ओकर अलग नाम अछि।
यही तऽ भाषा के सुंदरता अछि।
एकटा वस्तु के बारीकी सँ देखबाक आदत भाषा में शब्द पैदा करैत अछि।
पीती सेहो ओहि ग्रामीण शब्द-संसारक हिस्सा अछि।
मोमी सँ पैघ आकारक बाँसक टोकरी के संदर्भ में उक्त संसदीय वक्तव्य में पीती के नाम लेल गेल अछि।
आजक नजर सँ देखब तऽ लगि सकैत अछि—
“टोकरी तऽ टोकरी अछि।”
लेकिन पुरान ग्रामीण जीवन में टोकरी के आकार, बनावट आ उपयोगक बहुत महत्व छल।
जे किसान खेत सँ अनाज या सामान आनैत छल, जे परिवार घर में अनाज राखैत छल, जे महिला बाजार या आँगनक काम करैत छल—ओकरा लेल पात्रक आकारक फर्क महत्वपूर्ण छल।
तें भाषा में ओकर नाम सेहो अलग भेल।
यानी पीती केवल एकटा शब्द नहि, पुरान जीवन शैलीक संकेत अछि।
आज जखन प्लास्टिकक bucket, plastic basket आ ready-made सामान घर-घर पहुँचि गेल अछि, तखन बाँसक सामानक उपयोग घटल अछि।
संगहि घटल अछि ओहि सामान सँ जुड़ल शब्दक प्रयोग।
डुलिया शब्द बहुत लोक सुनने होयताह, मुदा ओकर पुरान ग्रामीण संदर्भ आजक पीढ़ी में ओतेक सहज नहि रहल।
बाँसक सामानक अलग-अलग आकारक चर्चा में डुलिया के सेहो उल्लेख भेटैत अछि।
डुलिया सुनिते मिथिलाक पुरान आँगनक तस्वीर आँखिक सामने आबि सकैत अछि।
माटिक घर।
आँगन।
बाँसक सामान।
अनाज।
चूल्हा।
धान।
पुआल।
गाय-बछड़ा।
आ घरक बीच में काम करैत परिवार।
आज ई सब दृश्य बहुत जगह बदलि रहल अछि।
मुदा शब्द के साथ समस्या ई अछि जे वस्तु कम इस्तेमाल होइत अछि तऽ शब्द सेहो धीरे-धीरे कम सुनाइत अछि।
एक समय में जे शब्द रोज सुनाइत छल, ओ आज “पुरान शब्द” कहल जा सकैत अछि।
चोंगी।
ई नाम सुनला पर आजक युवा शायद चौंकि जाए।
मुदा बाँसक सामानक आकार के संदर्भ में ई शब्द सेहो दर्ज अछि। उक्त संसदीय वक्तव्य में मोमी सँ शुरू कऽ अलग-अलग आकार के क्रम में चोंगी के उल्लेख कएल गेल अछि।
एहि शब्दक महत्व केवल एतेक नहि अछि जे ई “पुरान vocabulary” अछि।
महत्व ई अछि जे ई बतबैत अछि कि ग्रामीण समाज में लोक वस्तु के आकार आ उपयोग के कितनी बारीकी सँ पहचानैत छल।
आज supermarket में जाउ।
एके category के दस तरहक plastic container देखाइत अछि।
लेकिन हम ओकर नाम brand आ size सँ पहचानैत छी।
पुरान गाँव में वस्तु के पहचान स्थानीय उपयोग आ आकार सँ होइत छल।
भाषा ओहि अनुभव के दर्ज करैत छल।
चोंगा सेहो ओहि श्रृंखला में अबैत अछि।
मोमी, पीती, डुलिया, चोंगी के बाद पैघ आकार के रूप में चोंगा के उल्लेख भेटैत अछि।
आज अगर बच्चा सँ पूछल जाए—
“चोंगा की होइत अछि?”
शायद ओ उत्तर नहि देत।
लेकिन अगर दादा या नाना के समयक लोक सँ पूछब तऽ संभव अछि कि ओ केवल शब्द नहि बतौताह, बल्कि ओकरा बनाबय के तरीका, बाँस काटबाक तरीका आ ओकर उपयोगक कहानी सेहो सुनौताह।
यही अंतर अछि dictionary आ living language में।
Dictionary कहत—
“ई शब्दक अर्थ ई अछि।”
बुजुर्ग कहताह—
“हमरा समय में ई एना बनैत छल।”
दूसर वाला उत्तर ज्यादा कीमती अछि।
किएक तँ ओकर भीतर अनुभव अछि।
पथिया नाम सुनते मिथिलाक ग्रामीण जीवनक एकटा अलग दृश्य मन में आबैत अछि।
बाँसक सामानक अलग-अलग आकारक संदर्भ में पथिया के सेहो गिनाओल गेल अछि।
आजक पीढ़ी के लेल ई शब्द केवल एकटा vocabulary item भऽ सकैत अछि।
मुदा पुरान पीढ़ी लेल ई उपयोगी घरेलू चीजक नाम छल।
यही ठाम सँ हम भाषा के असली ताकत बुझि सकैत छी।
भाषा केवल कविता में नहि होइत।
भाषा खेत में अछि।
भाषा रसोई में अछि।
भाषा आँगन में अछि।
भाषा बाजार में अछि।
भाषा पशु सँ जुड़ल काम में अछि।
भाषा खेतीक हर चरण में अछि।
आ जब जीवन बदलैत अछि, तऽ भाषा के शब्द-संसार सेहो बदलैत अछि।
अब आबैत अछि ढिक्का।
बाँसक टोकरीक आकारक क्रम में ढिक्का के सेहो उल्लेख भेटैत अछि।
हमरा लेल एहि शब्दक सबसे रोचक बात ई अछि जे एकटा ग्रामीण वस्तु लेल केवल “टोकरी” कहि देब पर्याप्त नहि छल।
छोट आकारक अलग नाम।
थोड़ा पैघ के अलग नाम।
आओर पैघ के अलग नाम।
यानी भाषा वस्तु के केवल पहचान नहि करैत छल, बल्कि ओकर सूक्ष्म अंतर के सेहो बचबैत छल।
आज हम बहुत चीज के generic शब्द सँ बुलबैत छी।
“Box।”
“Basket।”
“Container।”
“Bag।”
लेकिन स्थानीय भाषा में कतेको बेर एकटा खास काम के खास चीजक अलग नाम होइत अछि।
एहि कारण सँ पुरान शब्द बचेनाइ केवल nostalgia नहि अछि।
ई ज्ञान बचेनाइ अछि।
ढकिया।
ई शब्द किछु क्षेत्र में आजो सुनल जा सकैत अछि, लेकिन युवा पीढ़ी के रोजमर्रा के भाषा में एकर इस्तेमाल बहुत जगह कम भऽ गेल अछि।
बाँसक सामानक आकारक सूची में ढकिया के सेहो उल्लेख अछि।
पुरान घर में सामान के राखबाक, ढकबाक आ व्यवस्थित करबाक तरीका अलग छल।
आज plastic के डिब्बा अछि।
Steel container अछि।
Fridge अछि।
Airtight box अछि।
लेकिन ई सभ चीज घर में बहुत बाद में धीरे-धीरे आयल।
पहिने स्थानीय सामग्री सँ बनेल चीज घरक जरूरत पूरा करैत छल।
एहि चीजक नाम भाषा में बसल छल।
वस्तु बदलल।
वस्तु के उपयोग बदलल।
आ धीरे-धीरे नाम सेहो पीछे छुटि रहल अछि।
ढाका एहि सूची में पैघ आकारक बाँसक सामानक नाम के रूप में उल्लेखित अछि।
एकटा बात पर ध्यान दी।
एहि नौ शब्द में लगभग सभक संबंध एकटा साधारण चीज—बाँसक सामान—सँ अछि।
मुदा एकटा छोट उदाहरण पूरा भाषा के संपन्नता देखाबैत अछि।
आज अगर हम कहब—
“बाँसक basket।”
बस।
लेकिन पुरान लोकजीवन में आकार बदलला के साथ शब्द बदलि रहल छल।
ई बतबैत अछि जे भाषा में लोकक कामक ज्ञान कतेक गहराई सँ दर्ज होइत छल।
एहि कारण सँ मिथिलाक पुराने शब्द के बचाबय के मतलब केवल मैथिली के शब्द बचाबय नहि अछि।
ओकर मतलब अछि—
मिथिलाक पुरान जीवनक ज्ञान बचाबय।
अब बाँसक टोकरी सँ निकलि कऽ चलू आमक बगान दिस।
टिकोला।
ई शब्द आजो बहुत मैथिल आ बिहारी परिवार में सुनाई पड़ि सकैत अछि, लेकिन शहर में पनपल बच्चा के लेल ई शब्द हमेशा उतना सहज नहि अछि।
आमक विकासक अलग-अलग चरण के संदर्भ में एक संसदीय वक्तव्य में गुजुर, मंजर, किरिया, टिकोला, कोसाइल, ज्वाल, उडहक, पाकल आ मधुआई जेकाँ स्थानीय शब्दक श्रृंखला बताओल गेल अछि।
एहि में टिकोला विशेष रूप सँ परिचित शब्द अछि—कच्चा, छोट आम।
लेकिन असली कहानी एतबे नहि अछि।
सोचू, एकटा फल के जीवनक अलग-अलग अवस्था लेल अलग-अलग नाम!
एहि बात सँ बुझाइत अछि जे लोक प्रकृति के कतेक नजदीक सँ देखैत छल।
आज हम कहैत छी—
“आम लगि गेल।”
“आम कच्चा अछि।”
“आम पक गेल।”
बस।
पुरान ग्रामीण जीवन में प्रकृति के निरीक्षण अधिक सूक्ष्म छल।
आ भाषा ओहि निरीक्षण के नाम दैत छल।
अब अगर हम फेर सँ एहि सूची दिस देखी—
तऽ ई सिर्फ दस शब्दक सूची नहि रहि जाइत अछि।
ई मिथिलाक दसटा खिड़की जेकाँ अछि।
एकटा खिड़की बाँसक कारीगरी दिस खुलैत अछि।
दोसर खेत दिस।
तेसर आमक बगान दिस।
चौथ ग्रामीण घर दिस।
पाँचम स्थानीय बाजार दिस।
आ धीरे-धीरे सभ मिलि कऽ एकटा पुरान मिथिला के तस्वीर बनबैत अछि।
हमरा हिसाब सँ असली चिंता ई नहि अछि जे कोई बच्चा “मोमी” नहि बुझैत।
असली चिंता ई अछि जे एक दिन बच्चा “ई शब्द किएक छल?” ई सवाल पूछबाक स्थिति में सेहो नहि रहत।
जखन शब्द गायब होइत अछि, तखन ओकरा सँ जुड़ल अनुभव सेहो कमजोर पड़ैत अछि।
मानू—
“ढकिया” शब्द खत्म भेल।
तऽ केवल एकटा शब्द नहि गेल।
ओकर संग बाँसक कारीगरीक एकटा हिस्सा सेहो कमजोर भेल।
“टिकोला” कम सुनायल।
तऽ आमक बगानक स्थानीय vocabulary में एकटा धागा कमजोर भेल।
एहि लेल भाषा बचेनाइ केवल grammar बचेनाइ नहि अछि।
शब्द बचेनाइ मतलब अनुभव बचेनाइ।
एहि विषय पर लिखैत समय हम एकटा गलती बहुत आसानी सँ कऽ सकैत छी—
“आजक बच्चा मैथिली नहि बोलैत अछि।”
“आजक generation सभ बिगड़ि गेल।”
“मोबाइल के कारण भाषा खत्म भऽ रहल अछि।”
मुदा बात एतेक सरल नहि अछि।
बच्चा वही बोलैत अछि जे ओकरा चारू कात सँ सुनाइत अछि।
अगर घर में माता-पिता लगातार हिंदी में बात करैत छथि, स्कूल हिंदी-अंग्रेजी में अछि, television हिंदी में अछि, YouTube पर हिंदी-अंग्रेजी content अछि, तऽ बच्चा naturally ओही vocabulary ग्रहण करत।
एहि लेल बच्चा के दोष देब समाधान नहि अछि।
समाधान अछि—
घर में मैथिली के जगह बनाउ।
अगर अहाँ चाहैत छी जे बच्चा पुरान मैथिली शब्द सीखय, तऽ ओकरा dictionary रटाबय के जरूरत नहि।
घर में रोज एकटा शब्द इस्तेमाल करू।
मानू आज “टिकोला”।
बच्चा पूछत—
“टिकोला की?”
माय कहि सकैत छथि—
“बाबू, आमक ई छोट अवस्था के टिकोला कहैत छी।”
बस।
भाषा सिखा देल गेल।
दोसर दिन दोसर शब्द।
एहि तरह एक साल में बच्चा दर्जनों स्थानीय शब्द सीखि सकैत अछि।
भाषा पढ़ाओल नहि जाएत।
भाषा जील जाएत।
आज Google पर बहुत किछु भेटैत अछि।
लेकिन अपन घरक बुजुर्गक memory के replace Google नहि कऽ सकैत अछि।
ककरो दादी सँ पूछू—
“ई शब्द के मतलब की?”
शायद ओ एकटा शब्दक संग पाँचटा कहानी सुना देती।
ककरो दादा सँ पूछू—
“ई सामान केना बनैत छल?”
शायद ओ कहताह—
“हमरा समय में बाँस काटि कऽ एना बनबैत छलहुँ।”
एहि तरह एकटा शब्द पूरा oral history खोलि दैत अछि।
तेँ बुजुर्ग के केवल परिवारक सदस्य नहि समझू।
ओ लोकभाषाक चलता-फिरता archive छथि।
अब केवल article पढ़ि कऽ छोड़ि देब सँ की फायदा?
अगर सचमुच मैथिली के पुराने शब्द बचाबय चाहैत छी, तऽ ई तीनटा काम बहुत सरल अछि।
एकटा notebook लिअ।
ऊपर लिखू—
हमर घरक मैथिली शब्द
फेर दादा-दादी, माय-पिताजी, चाचा-चाची सँ शब्द पूछू।
शब्द लिखू।
अर्थ लिखू।
कुन परिस्थिति में बोलल जाइत छल, ई लिखू।
जँ संभव हो तऽ एकटा example sentence सेहो लिखू।
दस साल बाद ई कॉपी family history बनि सकैत अछि।
ई काम और महत्वपूर्ण अछि।
दादा या दादी सँ कहू—
“अहाँ अपन समयक 10टा मैथिली शब्द बताउ।”
Mobile recording शुरू करू।
ओ शब्दक अर्थ पूछू।
कहू—
“एकरा वाक्य में कोना बोलैत छलहुँ?”
ई पाँच-दस मिनटक recording भविष्य में बहुत कीमती भऽ सकैत अछि।
किएक तँ लिखल शब्द अर्थ देत।
लेकिन बुजुर्गक आवाज शब्द के जीवन देत।
हर रविवार एकटा शब्द।
बस एकटा।
आज—
टिकोला।
अगिला सप्ताह—
कोनो दोसर स्थानीय शब्द।
फेर ओकर उपयोग।
फेर छोट कहानी।
एहि तरह एक साल में लगभग 50 शब्द।
पाँच साल में सैकड़ों शब्द।
ई भाषा बचाबय के बहुत practical तरीका अछि।
नहि।
आ जरूरी सेहो नहि जे हर शब्द रोजमर्रा के भाषा में वापस आबि जाए।
समाज बदलैत अछि।
काम बदलैत अछि।
वस्तु बदलैत अछि।
जीवन बदलैत अछि।
किछु शब्द स्वाभाविक रूप सँ कम होयत।
मुदा महत्वपूर्ण शब्द, लोकजीवन सँ जुड़ल शब्द, कृषि, हस्तकला, पर्व, खान-पान, रिश्तेदारी आ स्थानीय संस्कृति सँ जुड़ल शब्द के document जरूर कएल जा सकैत अछि।
यही ठाम technology काम आबैत अछि।
आज एकटा mobile camera पूरा गाँवक शब्दावली रिकॉर्ड कऽ सकैत अछि।
मैथिली के साहित्यिक परंपरा बहुत समृद्ध अछि।
Sahitya Akademi के वर्तमान records में मैथिली के अलग Advisory Board अछि आ मैथिली में publications आ literary awards के दीर्घ परंपरा दर्ज अछि। Sahitya Akademi के records के अनुसार मैथिली में Akademi Award 1966 सँ देल जा रहल अछि।
एहि बातक मतलब ई अछि जे मैथिली केवल घरक बातचीत तक सीमित भाषा नहि अछि।
एहि में—
कविता अछि।
उपन्यास अछि।
कहानी अछि।
लोक साहित्य अछि।
नाटक अछि।
संस्मरण अछि।
आ लोकभाषाक विशाल शब्द-संपदा अछि।
Sahitya Akademi के Maithili catalogue में “मैथिली लोकोक्ति संचय”, “मैथिली लोक साहित्य” आ अन्य साहित्यिक-सांस्कृतिक सामग्रीक उल्लेख भेटैत अछि।
कतेको बेर हम सोचैत छी जे कठिन शब्द बचा लेब तऽ भाषा बचि जाएत।
ई पूरा सच नहि अछि।
भाषा तखन बचैत अछि जखन लोक ओकरा अपन समझैत अछि।
जखन माय बच्चा सँ मैथिली में बात करैत छथि।
जखन दादा पोता के कहानी सुनबैत छथि।
जखन बहिन भाई सँ अपन भाषा में हँसैत अछि।
जखन विवाह में मैथिली गीत बजैत अछि।
जखन खेत में स्थानीय शब्द सुनाइत अछि।
जखन बाजार में अपन बोली सुनिकऽ मन खुशी होइत अछि।
शब्द ओहि अपनापनक हिस्सा छथि।
हम बच्चा के मोबाइल देब।
Education देब।
English सिखाएब।
Technology सिखाएब।
Career देब।
ई सभ जरूरी अछि।
मुदा संगहि अगर हम ओकरा एकटा चीज और दे सकी—
अपन भाषा।
तऽ ओकरा अपन अतीत सँ जोड़बाक एकटा रास्ता मिलि जाएत।
ओ विदेश में रहत।
शहर में नौकरी करत।
कदाचित पूरा जिनगी मिथिला सँ बाहर बिताओत।
मुदा अगर एक दिन कोनो बुजुर्गक आवाज सुनि कऽ कहि दे—
“अहाँ हमरा ई पुरान शब्द सिखौने छलहुँ।”
तऽ समझू भाषा जीत गेल।
शीर्षक में हम लिखलहुँ—
“मिथिलाक 10 एहन शब्द जे अगिला पीढ़ी शायद भुलि जाएत”
ई डर देखाबय लेल अछि।
मुदा articleक असली उद्देश्य डर पैदा करब नहि अछि।
उद्देश्य अछि—
भुलाय सँ पहिने याद करब।
हमरा ई नहि चाही जे अगिला पीढ़ी कहय—
“ई शब्द हम किताब में पढ़ने छी।”
हम चाहैत छी ओ कहय—
“ई शब्द हमर दादी बोलैत छथि।”
एहि दू वाक्य में बहुत पैघ अंतर अछि।
पहिल वाक्य में इतिहास अछि।
दोसर वाक्य में जीवित भाषा अछि।
कोनो बड़ा अभियान के इंतजार नहि करू।
आज घर में एकटा शब्द बोलू।
कल दोसर।
एकटा बुजुर्ग सँ पूछू।
एकटा बच्चे के सिखाउ।
एकटा video बनाउ।
एकटा article लिखू।
एकटा पुरान notebook सुरक्षित रखू।
एकटा लोकगीत record करू।
एकटा पुरान सामानक फोटो खींचू।
एहि छोट-छोट काम सँ भाषा के बड़ा archive बनि सकैत अछि।
मोमी कहला पर शायद आज बहुत लोकक आँखि में कोनो तस्वीर नहि बनत।
पीती सुनला पर शायद dictionary खोजय पड़त।
डुलिया, चोंगी, चोंगा, पथिया, ढिक्का, ढकिया, ढाका—ई सभ नाम धीरे-धीरे रोजमर्रा के बातचीत सँ दूर भऽ रहल अछि।
टिकोला आजो बहुत घर में सुनाइत अछि, लेकिन ओकरा संग जुड़ल आमक विकासक पूरा स्थानीय शब्द-संसार बहुत कम लोक जानैत छथि।
मुदा ई सभ शब्द के कहानी एतबे अछि जे—
एक समय में मिथिला के लोक अपना चारू कात के दुनिया के बहुत बारीकी सँ देखैत छल।
बाँसक सामान छोट छल तऽ नाम अलग।
बड़का छल तऽ नाम अलग।
आमक अवस्था बदलल तऽ नाम बदलल।
काम बदलल तऽ शब्द बदलल।
वस्तु बदलल तऽ vocabulary बदलल।
यानी भाषा केवल बोलबाक माध्यम नहि छल।
भाषा जीवन के नक्शा छल।
आज हम modern दुनिया में छी।
Plastic अछि।
Mobile अछि।
Internet अछि।
AI अछि।
English अछि।
शहर अछि।
सब जरूरी अछि।
मुदा एहि सबके बीच अगर अपन भाषा के छोट-छोट शब्द बचि गेल, तऽ अपन अतीत सँ एकटा धागा जुड़ल रहत।
आ जखन अगिला पीढ़ी पूछत—
“दादी, टिकोला की होइत अछि?”
तऽ दादी मुस्कुरा कऽ कहि सकत छथि—
“बाबू, आम पकबाक पहिने जे छोट-छोट अवस्था होइत अछि ने, ओकरा टिकोला कहैत छी।”
ओहि क्षण में केवल एकटा शब्द नहि बचत।
एकटा पीढ़ी बचत।
एकटा स्मृति बचत।
एकटा गाँव बचत।
एकटा जीवन शैली बचत।
आ शायद—
मिथिलाक एकटा छोट हिस्सा फेर सँ बोलि उठत।
मैथिली भाषा के सबसे पैघ खतरा ई नहि अछि जे ओकर शब्द कठिन छथि।
सबसे पैघ खतरा तखन होइत अछि, जखन घर में कोनो बच्चा अपन बुजुर्गक शब्द सुनबाक मौका नहि पबैत।
तेँ शब्द के किताब में नहि, बातचीत में वापस आनू।
किएक तँ—
“जे शब्द घर में बोलल जाइत अछि, ओ शब्द मरैत नहि अछि।”
आ शायद एहि लेल आज सँ एकटा छोट काज करू—
अपन घरक पाँच पुरान मैथिली शब्द लिखू।
अहाँक पाँच शब्द कदाचित हमर अगिला articleक दस शब्द सँ सेहो बेसी कीमती होयत।
कहियो अहाँ ककरो मैथिल आदमी के माथ पर पाग पहिरल देखलहुँ अछि? शायद पहली नजर…
मिथिला छोड़ि परदेश गेल लोक फेर अपन माटि पर किएक लौटैत अछि? गाँव, याद आ…
मैथिली भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि मिथिला की पहचान, परिवार की स्मृति और…
चौरचन की कथा क्या है? जानें चौठचंद्र की कहानी, मान्यता और मिथिला की परंपरा मिथिला…
चौरचन पर्व 2026: चौठचंद्र कब है? जानिए पूजा विधि, कथा, अरिपन, पकवान और मिथिला की…
नेपाल में इतनी भयानक बाढ़ आखिर आई कैसे? ग्लेशियर टूटने से मची तबाही की पूरी…