“शहर में बहुत कुछ मिलल, मुदा अपन गाँवक माटि जेकाँ सुकून कतहु नहि भेटल।”
कहियो-कहियो आदमी घर छोड़ैत अछि, मुदा घर ओकरा नहि छोड़ैत।
मिथिला के कतेको घरक कहानी लगभग एक्के जकाँ अछि। घर में जवान बेटा अछि, खेत अछि, आँगन अछि, बूढ़ माय-बाबू छथि। मुदा रोजगारक खोज में एक दिन ओ दिल्ली चलि जाइत अछि, मुंबई चलि जाइत अछि, पंजाब, गुजरात, सूरत, लुधियाना, बेंगलुरु या कोनो दोसर शहर दिस निकलि जाइत अछि।
शुरुआत में सब ठीक लगैत अछि।
नयका शहर।
नयका काम।
हाथ में कमाई।
घर पर पैसा पठेबाक खुशी।
परिवार के लोक कहैत छथि—“बेटा बाहर गेल अछि, मेहनत करैत अछि।”
मुदा कुछ साल बीतला के बाद ओही आदमी के मन में एकटा सवाल बार-बार उठैत अछि—
“आखिर अपन गाँव कब लौटब?”
ई सवाल केवल थाकल शरीरक नहि अछि।
ई सवाल घरक अछि।
माय-बाप के अछि।
ओहि पोखरिक अछि जाहि में बचपन में नहायल गेल छल।
ओहि खेतक अछि जतय धानक पौधा के बीच दौड़ल गेल छल।
ओहि आँगनक अछि जतय दादी कथा सुनबैत छलीह।
आ ओहि माटिक अछि जाहि माटि के छोड़ि आदमी पैसा कमेबाक लेल परदेश गेल छल।
आज मिथिला के गाँव छोड़ि बाहर रहनिहार लोकक संख्या आ migration के कारण समझबाक लेल सरकारी Census data सेहो महत्वपूर्ण अछि। भारतक 2011 Census में बिहार के migration tables में काम/रोजगार, व्यापार, शिक्षा, विवाह, परिवारक साथ स्थान परिवर्तन आदि अलग-अलग कारण दर्ज कएल गेल अछि।
मुदा आँकड़ा केवल संख्या बतबैत अछि।
गाँव छोड़बाक असली कहानी आदमी अपन जीवन सँ लिखैत अछि।
ककरो गाँव छोड़बाक कारण एक नहि होइत अछि।
ककरो रोजगार नहि भेटैत अछि।
ककरो खेती सँ परिवार चलौनाइ कठिन बुझाइत अछि।
ककरो बच्चा के पढ़ाई लेल शहर जाए पड़ैत अछि।
ककरो परिवारक जिम्मेदारी एतेक बढ़ि जाइत अछि जे बाहर कमाई जरूरी भऽ जाइत अछि।
आ ककरो लेल गाँव छोड़ब मजबूरी नहि, अवसर होइत अछि।
शहर में अधिक कमाई के संभावना देखाइत अछि।
बिहार के migration data में रोजगार, व्यापार, शिक्षा आ परिवारक साथ स्थान परिवर्तन जेकाँ कारण अलग-अलग दर्ज छथि। यानी गाँव सँ बाहर जाएबाक पीछे केवल “गाँव खराब अछि” वाला एकटा कारण नहि अछि; जीवनक परिस्थिति अनुसार कारण बदलैत अछि।
एहि बात के समझब बहुत जरूरी अछि।
किएक तँ जे आदमी परदेश गेल अछि, ओ अपन गाँव सँ प्रेम नहि करैत अछि—एहन सोच गलत होयत।
बहुत बेर आदमी गाँव के छोड़ैत अछि, गाँव के नहिं।
कल्पना करू।
मिथिला के कोनो छोट गाँवक एकटा युवक अछि।
बाबू खेती करैत छथि।
माय घर संभालैत छथि।
परिवार में छोट भाई-बहिन छथि।
युवक पढ़ल-लिखल अछि, मुदा गाँव में ओकरा मनपसंद नौकरी नहि भेटैत अछि।
एक दिन ओ दिल्ली जाए के फैसला करैत अछि।
बस पकड़बाक समय माय बार-बार एक्के बात कहैत छथि—
“समय पर खाना खायब।”
बाबू शायद बहुत बात नहि कहैत छथि।
बस हाथ में किछु पैसा दैत छथि।
“रास्ता में काम आएत।”
“परदेश कमाई देलक, मुदा गाँव अपनापन देलक।”
बेटा हँसि कऽ कहैत अछि—
“चिंता नहि करू।”
बस चलि जाइत अछि।
माय सड़क दिस ताकैत रहि जाइत छथि।
एहि दृश्य में migration के पूरा दर्द छुपल अछि।
शहर पहुँचलाक बाद जीवन बदलि जाइत अछि।
कामक समय बढ़ैत अछि।
कमरा छोट होइत अछि।
चारि-पाँच आदमी एकटा कमरा में रहैत छथि।
खाना अपने बनबैत छथि या बाहर सँ खाइत छथि।
गाँव में जे आदमी अपन खेत में खुला आकाश देखैत छल, शहर में ओकर दिन कई बेर एकटा कमरा आ सड़कक बीच कटैत अछि।
मुदा ओ कमाइत अछि।
आ घर पैसा पठबैत अछि।
माय कहैत छथि—
“बेटा नीक कमाइत अछि।”
मुदा माय ई नहि कहैत छथि—
“बेटा बहुत याद अबैत अछि।”
शहर आदमी के बहुत किछु दैत अछि।
रोजगार दैत अछि।
कमाई दैत अछि।
नई चीज सीखबाक मौका दैत अछि।
बच्चा के बेहतर पढ़ाईक अवसर दैत अछि।
नयका दुनिया देखबैत अछि।
एहि कारण शहर के केवल नकारात्मक रूप में देखब सही नहि होयत।
मुदा शहर के अपन सीमा सेहो अछि।
गाँव में जखन आदमी बाजार जाएत अछि तँ रास्ता में दस आदमी रोकि लेत।
“कहाँ जा रहल छी?”
“कखन एलहुँ?”
“माय के हाल केहन अछि?”
शहर में कई बेर आदमी महीनों पड़ोसी के नाम तक नहि जानैत अछि।
यही फर्क धीरे-धीरे मन में जमा होइत अछि।
कमाई बढ़ि रहल अछि।
मुदा अपनापन कम भऽ रहल अछि।
आ तखन मन कहैत अछि—
“गाँव में पैसा कम छल, मुदा लोक बहुत छल।”
मिथिला के माटि केवल खेतक माटि नहि अछि।
ई स्मृति अछि।
ई आवाज अछि।
ई संबंध अछि।
ई भाषा अछि।
ई त्योहार अछि।
ई पोखरि अछि।
ई आँगन अछि।
ई ओहि लोकक चेहरा अछि जे अहाँ के बिना स्वार्थ के पहचानैत अछि।
मिथिला के संस्कृति में परिवार आ सामुदायिक जीवनक भूमिका बहुत गहरी रहल अछि। लोकगीत, विवाहक परंपरा, पर्व, खेती-किसानी आ पारिवारिक संस्कार—ई सभ गाँवक जीवन के केवल गतिविधि नहि बनबैत, बल्कि सामाजिक संबंधक हिस्सा बनबैत अछि।
मिथिला के सांस्कृतिक जीवन में भाषा आ लोकपरंपराक महत्व पर कई स्थानीय सामग्री में सेहो जोर देल गेल अछि।
एहि कारण परदेश में रहनिहार व्यक्ति के गाँवक याद केवल घरक याद नहि होइत अछि।
ओ एकटा पूरा जीवन-पद्धतिक याद होइत अछि।
ई शायद सबसे भावुक कारण में सँ एकटा अछि।
जब आदमी छोट छल, दादी कथा सुनबैत छलीह।
कहियो राजा-रानी।
कहियो लोककथा।
कहियो भगवानक कथा।
कहियो अपन बचपनक कहानी।
बच्चा ध्यान सँ सुनैत छल।
तखन ओहि कहानीक महत्व बुझाइत नहि छल।
मुदा जखन ओही बच्चा के शहरक एकटा कमरा में राति में अकेले रहबाक पड़ैत अछि, तखन अचानक दादीक आवाज याद अबैत अछि।
“सुतऽ बेटा।”
“बहुत राति भऽ गेल।”
“काल्हि जल्दी उठब।”
ई शब्द छोट छल।
मुदा जीवन में ओकर अर्थ बहुत पैघ छल।
शहर में swimming pool होयत।
बड़का park होयत।
Mall होयत।
Cinema होयत।
मुदा बचपनक पोखरि अलग होइत अछि।
गर्मी के दिन।
दोस्तक टोली।
पोखरि में छलांग।
किनार पर कपड़ा।
माय के डाँट।
आ साँझ में घर लौटबाक डर—
“एतेक देर कहाँ छलऽ?”
शहर में रहनिहार आदमी के शायद पोखरि के पानी नहि चाही।
ओ केवल ओहि समय के खोजैत अछि जे फेर कहियो लौटि नहि सकैत।
गाँवक याद अक्सर जगहक याद नहि, समयक याद होइत अछि।
मिथिला के बहुत परिवार खेती सँ जुड़ल रहल अछि।
किसी परिवारक खेत छोट होय।
किसी के पैघ।
किसी के जमीन उपजाऊ होय।
किसी के परिस्थिति कठिन होय।
मुदा खेत केवल उत्पादनक साधन नहि होइत अछि।
बचपन में बच्चा बाबू के साथ खेत जाएत अछि।
धानक रोपनी देखैत अछि।
गेहूँ कटैत देखैत अछि।
सरसों के पीयर फूल देखैत अछि।
बरसात में खेतक गंध महसूस करैत अछि।
ई सभ अनुभव बाद में स्मृति बनि जाइत अछि।
शहर में जब आदमी किसी सड़क किनारे हरियर खेत देखैत अछि, तखन ओकर आँखि एक क्षण लेल ठहरि जाइत अछि।
किएक?
किएक तँ ओकर भीतर कोनो पुरान दृश्य जागि उठैत अछि।
ई बात बहुत महत्वपूर्ण अछि।
गाँव वापसी के केवल बेरोजगारी या असफलता सँ जोड़ब गलत होयत।
कतेको लोक बाहर कमाई के बाद जान-बूझकर गाँव में रहबाक फैसला करैत छथि।
ककरो परिवारक जिम्मेदारी बढ़ैत अछि।
ककरो बच्चा बड़ा भऽ जाइत अछि।
ककरो बाबू-माय बूढ़ भऽ जाइत छथि।
ककरो शहरक भागदौड़ सँ थकान होइत अछि।
ककरो अपन जमीन पर किछु करबाक इच्छा होइत अछि।
ककरो छोट व्यवसाय शुरू करबाक सपना होइत अछि।
ककरो मन कहैत अछि—
“जे जीवन हम बाहर खोजैत रहलहुँ, ओकर किछु हिस्सा अपन गाँव में बनायल जा सकैत अछि।”
यही सोच गाँव वापसी के एकटा नया रूप दैत अछि।
जरूरी नहि।
ई article गाँव के केवल romantic तस्वीर देखाबय लेल नहि अछि।
गाँव में अपन समस्या छथि।
स्वास्थ्य सुविधा हर जगह समान नहि।
शिक्षा के गुणवत्ता में अंतर होइत अछि।
रोजगारक विकल्प सीमित हो सकैत अछि।
सड़क, इंटरनेट, transport आ market के सुविधा जगह अनुसार अलग होइत अछि।
एहि कारण बहुत लोक चाहि कऽ सेहो स्थायी रूप सँ वापस नहि आबि पबैत छथि।
ई सच्चाई स्वीकार करब जरूरी अछि।
गाँव से प्रेम और गाँव में रहना—दो अलग चीज होइत अछि।
ककरो मन गाँव में होइत अछि, मुदा नौकरी शहर में।
ककरो घर गाँव में होइत अछि, मुदा परिवार शहर में।
ककरो जमीन गाँव में होइत अछि, मुदा व्यवसाय बाहर।
आज migration एकटा सीधा “गेल या लौटि आएल” वाला कहानी नहि रहल।
जीवन दू ठाम बँटि गेल अछि।
बहुत परिवारक स्थिति देखू।
घर मिथिला में।
कमाई दिल्ली में।
बच्चा पटना में पढ़ैत अछि।
बेटी विवाहक बाद दोसर शहर में।
बाबू गाँव में।
माय कहियो गाँव, कहियो बेटाक शहर में।
यानी परिवारक जीवन कई जगह में बँटि गेल।
त्योहार के समय सभकेँ एकठाम आबबाक कोशिश होइत अछि।
चौरचन।
छठ।
जितिया।
सामा-चकेवा।
विवाह।
मधुश्रावणी।
एहि पर्वक समय गाँव अचानक भरि जाइत अछि।
जे घर साल भरि शांत छल, ओहि घर में अचानक बच्चा के आवाज सुनाइत अछि।
आँगन में हँसी।
रसोई में चहल-पहल।
बाहर मोटरसाइकिल।
दरवाजा पर रिश्तेदार।
बुजुर्गक चेहरा पर खुशी।
ई दृश्य बतबैत अछि कि परदेश गेल लोक के नाता गाँव सँ टूटल नहि अछि।
किएक तँ त्योहार केवल पूजा नहि होइत अछि।
त्योहार परिवार के एकत्र करबाक अवसर होइत अछि।
मिथिला के पर्व-त्योहारक सामाजिक पक्ष बहुत मजबूत अछि।
जितिया में परिवार आ संतानक भावना जुड़ल अछि।
मधुश्रावणी में विवाह, परिवार, परंपरा आ लोकगीतक संबंध देखाइत अछि।
चौरचन जेकाँ पर्व में घरक आँगन, परिवार, अरिपन, पकवान आ लोकपरंपरा एक साथ जुड़ैत अछि।
एहि कारण जब परदेश में रहनिहार आदमी कहैत अछि—
“पर्व में घर जाएब।”
तँ असल में ओ केवल पूजा लेल नहि आबि रहल अछि।
ओ अपन लोकक बीच लौटि रहल अछि।
अक्सर लोग सोचैत अछि कि बाहर से लौटल व्यक्ति पैसा, आराम या सुविधा खोजत।
मुदा कई बेर ओकर पहली जरूरत बहुत साधारण होइत अछि।
घरक खाना।
माय के हाथक खाना।
आँगन में बैठब।
बाबू के साथ बात करब।
पुरान दोस्त सँ भेट।
गाँव में पैदल घूमब।
पोखरि देखब।
खेत देखब।
मंदिर या चौक पर पुरान लोकक बीच बैठब।
ककरो लेल ई सब बहुत छोट बात अछि।
मुदा परदेश में रहनिहार के लेल ई चीज महँगा होइत अछि।
किएक तँ पैसा खर्च कऽ शहर में बहुत किछु खरीदल जा सकैत अछि।
मुदा अपन बचपन खरीदल नहि जा सकैत।
कतेको प्रवासी लोक कहैत छथि कि बाहर सब तरहक खाना भेटैत अछि।
Restaurant अछि।
Fast food अछि।
अलग-अलग राज्यक खाना अछि।
मुदा माय के हाथक सादा दाल-भात, सब्जी, दही, अचार या गाँवक पारंपरिक भोजन के स्वाद अलग होइत अछि।
स्वाद में सिर्फ मसाला नहि होइत।
स्मृति होइत अछि।
बचपन होइत अछि।
माय होइत छथि।
यही कारण आदमी शहर में कितना भी अच्छा खाना खा ले, घर लौटला पर कहैत अछि—
“माय, ओ पुरान वाला खाना बना दियौ।”
बहुत बेर डर पैसा कम नहि होयबाक नहि होइत।
डर ई होइत अछि कि—
“कहीं घर बहुत बदलि नहि जाए।”
बाबू बूढ़ होइत छथि।
माय के चाल धीमा होइत अछि।
पुरान घरक दीवार कमजोर होइत अछि।
गाँवक किछु लोक शहर चलि जाइत छथि।
किछु दोस्त नहि रहि जाइत छथि।
किछु पेड़ कटि जाइत अछि।
किछु रास्ता बदलि जाइत अछि।
किछु आवाज फेर कहियो नहि सुनाइत अछि।
एहि कारण प्रवासी लोक के भीतर एकटा बेचैनी रहैत अछि।
ओ सोचैत अछि—
“अगिला बेर जाएब।”
मुदा अगिला बेर कखन?
कई बेर बहुत देर भऽ जाइत अछि।
घर लौटब एकटा भाव अछि।
ककरो लेल तीन दिनक छुट्टी में घर लौटब घर वापसी अछि।
ककरो लेल साल में एक बेर।
ककरो लेल नौकरी छोड़ि स्थायी रूप सँ गाँव आबि जाएब।
आ ककरो लेल जीवन के आखिरी समय अपन गाँव में बितेबाक इच्छा।
सबकेँ घर वापसी अलग तरह सँ महसूस होइत अछि।
मुदा भाव एक्के अछि—
“हम अपन लोकक बीच छी।”
ई भविष्यक बहुत महत्वपूर्ण सवाल अछि।
आजक युवा के सामने अवसर अधिक अछि।
ओ online काम करि सकैत अछि।
अपना business शुरू करि सकैत अछि।
Digital service दे सकैत अछि।
Content बना सकैत अछि।
कृषि के आधुनिक तरीका अपना सकैत अछि।
स्थानीय product बेच सकैत अछि।
Tourism, food, handicraft आ culture-based business में सेहो अवसर बनि सकैत अछि।
मुदा हर व्यक्ति के गाँव में लौटब जरूरी नहि।
जरूरी ई अछि कि गाँव में रहबाक विकल्प बने।
अगर गाँव में अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, internet, transport, market और रोजगार के अवसर बढ़ैत छथि, तखन migration केवल मजबूरीक रास्ता नहि रहत।
लोक बाहर जाएत भी, मुदा वापस आबि सकबाक संभावना मजबूत होयत।
ई गलतफहमी बहुत सामान्य अछि।
अगर कोनो युवक शहर सँ गाँव लौटैत अछि तँ जरूरी नहि कि ओ खेत में हल चलाबय।
ओ teacher भऽ सकैत अछि।
Online काम करि सकैत अछि।
Shop खोलि सकैत अछि।
Food business शुरू करि सकैत अछि।
Mithila handicraft के online बेचि सकैत अछि।
Local tourism पर काम करि सकैत अछि।
Video content बना सकैत अछि।
अपन परिवारक पुरान व्यवसाय के नया रूप दऽ सकैत अछि।
गाँव में रहि कऽ दुनिया सँ जुड़ल जा सकैत अछि।
यही बदलाव आने वाले समय में बहुत महत्वपूर्ण होयत।
पैसा नहि।
केवल जमीन नहि।
सबसे पैघ पूँजी अछि—
लोक।
परिवार।
रिश्ता।
भरोसा।
परंपरा।
लोकगीत।
भाषा।
हुनर।
गाँवक अनुभव।
मिथिला के सांस्कृतिक सामग्री में गाँवक जीवन, लोकगीत, पर्व आ पारंपरिक कला के जो महत्व दिखैत अछि, ओ केवल पुरान बात नहि अछि; ई आजक cultural identity के सेहो हिस्सा अछि।
अगर एहि पूँजी के आधुनिक अवसर सँ जोड़ि देल जाए, तँ गाँवक कहानी बदलि सकैत अछि।
ई सवाल सेहो जरूरी अछि।
गाँव से बहुत किछु मिलैत अछि।
मुदा बाहर गेल लोक गाँव के वापस की देत?
एकटा idea।
एकटा skill।
एकटा investment।
एकटा छोट business।
एकटा पुस्तकालय।
एकटा computer।
एकटा scholarship।
एकटा digital service।
एकटा छोट training center।
या केवल अपन अनुभव।
हर व्यक्ति करोड़ों रुपये लेकर वापस नहि आबि सकैत अछि।
मुदा अनुभव लेकर जरूर आबि सकैत अछि।
किसी ने शहर में marketing सीखी।
किसी ने technology।
किसी ने accounting।
किसी ने construction।
किसी ने food business।
किसी ने teaching।
अगर एहि अनुभव के गाँव के जरूरत सँ जोड़ल जाए, तँ बहुत किछु बदलि सकैत अछि।
हम अक्सर कहैत छी—
“हमरा गाँव बहुत नीक छल।”
“हमरा गाँवक पोखरि याद अबैत अछि।”
“माय के खाना याद अबैत अछि।”
“गाँवक लोक बहुत अपन छल।”
मुदा केवल याद करला सँ गाँव मजबूत नहि होयत।
गाँव के जरूरत अछि कि जे लोक बाहर छथि, ओ अपन क्षमता अनुसार किछु योगदान करथि।
जरूरी नहि कि सभ वापस आबि जाए।
ककरो साल में एक बेर।
ककरो online।
ककरो पैसा से।
ककरो समय से।
ककरो knowledge से।
यही तरह प्रवासी आ गाँव के रिश्ता नया रूप ले सकैत अछि।
पैसा कमेबाक बीच समय निकालब कठिन अछि।
मुदा परिवार आ गाँव से संबंध केवल phone call से नहि चलैत।
समय-समय पर वापस आबि अपन घर, खेत, बुजुर्ग आ रिश्तेदार सँ भेट करब बहुत जरूरी अछि।
गाँवक इतिहास।
पुरान फोटो।
लोकगीत।
बुजुर्गक कहानी।
मंदिरक इतिहास।
पोखरि।
पुरान घर।
कृषि परंपरा।
ई सभ mobile से record कएल जा सकैत अछि।
अगर संभव हो तँ स्थानीय युवक सँ काम लिअ।
स्थानीय product खरीदू।
गाँवक कारीगर के online customer सँ जोड़ू।
किसी बच्चा के पढ़ाई में मदद करू।
छोट काम छोट लगैत अछि।
मुदा कई छोट काम मिलि कऽ बड़ा परिवर्तन बनैत अछि।
ई सवालक जवाब बहुत सीधा अछि।
किएक तँ प्रेम आ रोजगार एक्के चीज नहि अछि।
गाँव से प्रेम हो सकैत अछि, मुदा नौकरी शहर में।
घर गाँव में हो सकैत अछि, मुदा college बाहर।
माय-बाबू गाँव में हो सकैत छथि, मुदा business दूसरे शहर में।
इसलिए गाँव छोड़ना हमेशा गाँव से नाराज होना नहि होइत।
बहुत बेर ई जीवनक मजबूरी अछि।
एहि फर्क के समझब जरूरी अछि।
हम प्रवासी लोक के दोष देकर समस्या के हल नहि करि सकैत छी।
समस्या के हल तखन होयत जखन गाँव में विकल्प बढ़त।
ई आजक सबसे बड़ा सवाल अछि।
क्या गाँव खाली बूढ़ लोकक जगह बनि जाएत?
क्या जवान पीढ़ी बाहर चली जाएत?
क्या पुरान घर बंद पड़त?
क्या खेत में मजदूर कम पड़त?
क्या लोकगीत केवल YouTube में बचत?
या गाँव नयका रूप में बदलत?
शायद सही रास्ता बीच में अछि।
गाँव के पुरान पहचान बचत।
मुदा सुविधा आधुनिक होयत।
मैथिली रहत।
मुदा technology सेहो रहत।
खेती रहत।
मुदा modern farming सेहो आएत।
लोकगीत रहत।
मुदा digital recording सेहो होयत।
पुरान घर रहत।
मुदा नयका सुविधा सेहो होयत।
गाँव के बचेनाइ मतलब गाँव के समय में रोकि देनाइ नहि अछि।
गाँव के बचेनाइ मतलब ओकर आत्मा के बचब आ ओकर जीवन के समय के साथ आगे बढ़ेनाइ अछि।
सोचू, राति के समय घर के बाहर गाड़ी रुकल।
दरवाजा खुलल।
बेटा उतरि गेल।
माय बाहर आबि गेली।
किछु सेकेंड दुनू चुप।
फेर माय कहली—
“एतेक दिन बाद अएलऽ?”
बेटा हँसल।
“काम बहुत छल माय।”
माय शायद नाराज होयबाक नाटक करथि।
“काम तऽ हमेशा रहत।”
बस।
एहि एकटा वाक्य में पूरा मिथिला बसल अछि।
किएक तँ माय के असली शिकायत ई नहि कि बेटा पैसा कम नहि पठबैत।
शिकायत ई अछि कि—
“तू हमरा लग बैसल नहि।”
ई कारण बहुत बेर आदमी जब गाँव लौटैत अछि, तँ ओकरा पैसा सँ ज्यादा समय देबाक मन करैत अछि।
नहि।
आ जरूरी सेहो नहि।
ककरो जीवन शहर में बनि गेल।
ककरो बच्चा शहर में पढ़ैत अछि।
ककरो business बाहर अछि।
ककरो स्वास्थ्य सुविधा बाहर चाही।
ककरो नौकरी वापस आबय नहि देत।
मुदा “वापसी” के मतलब केवल स्थायी रूप सँ गाँव में बसि जाएब नहि होयत।
कभी-कभी साल में एक बेर घर आना भी वापसी अछि।
कभी माँ-बाबू के शहर बुलाना भी संबंध बचाना अछि।
कभी गाँव में investment करना भी वापसी अछि।
कभी अपने बच्चे को गाँव की कहानी सुनाना भी वापसी अछि।
आ कभी अपन भाषा में बात करब भी वापसी अछि।
शायद किएक तँ आदमी जहाँ से बनैत अछि, ओकर एक हिस्सा वहीं रहि जाइत अछि।
हम शहर में अपना पहचान बना सकैत छी।
नई नौकरी।
नयका दोस्त।
नयका घर।
नयका जीवन।
मुदा बचपनक पहचान मिटैत नहि।
गाँवक रास्ता याद रहैत अछि।
घरक दरवाजा याद रहैत अछि।
आँगन याद रहैत अछि।
बाबू के आवाज याद रहैत अछि।
माय के हाथक खाना याद रहैत अछि।
दादीक कहानी याद रहैत अछि।
मिथिला के बोली याद रहैत अछि।
आ कखन-कखन बिना कोनो कारण के मन कहि दैत अछि—
“चल, घर चल।”
शायद असली सवाल ई नहि अछि कि—
“मिथिला के लोक गाँव वापस किएक अबैत अछि?”
असल सवाल ई अछि—
“गाँव छोड़ि गेल आदमी के मन में गाँव रहैत किएक अछि?”
किएक तँ अगर गाँव केवल जमीन होइत, तँ आदमी उसे बेचि दैत।
अगर गाँव केवल मकान होइत, तँ नयका मकान बना लेत।
अगर गाँव केवल सड़क आ खेत होइत, तँ शहर में वैकल्पिक जगह खोजि लेत।
मुदा गाँव इन सब सँ ज्यादा अछि।
गाँव एकटा भावनात्मक पता अछि।
जाहि पर आदमी के नाम लिखल नहि होइत।
मुदा दिल में ओकर स्थायी पता रहैत अछि।
बहुत साल तक विकास के मतलब मानल गेल कि गाँव सँ शहर जाएब।
अच्छा school = शहर।
अच्छा hospital = शहर।
अच्छा job = शहर।
अच्छा business = शहर।
धीरे-धीरे गाँव के अर्थ “जहाँ से निकलना है” बनि गेल।
अब सोच बदलबाक जरूरत अछि।
गाँव के अर्थ “जहाँ लौटकर भी कुछ किया जा सकता है” बनबाक चाही।
ई बदलाव केवल सरकार से नहि होयत।
स्थानीय लोग, प्रवासी, छोटे business, technology, education आ community सभकेँ मिलकर काम करय पड़त।
बच्चा के केवल ई नहि कहू—
“हमरा समय में गाँव बहुत अच्छा छल।”
उसे गाँव दिखाउ।
खेत दिखाउ।
पोखरि दिखाउ।
पुरान घर दिखाउ।
दादी सँ बात कराउ।
लोकगीत सुनाउ।
मधुबनी painting देखाउ।
गाँवक इतिहास बताउ।
मिथिला के पर्व में शामिल कराउ।
आ सबसे जरूरी—
उसे गाँव के भविष्य में हिस्सा बनाउ।
अगर बच्चा गाँव के केवल पुरानी याद समझत, तँ शायद वापस नहि आएत।
अगर बच्चा गाँव के संभावनाकेँ देखत, तँ शायद कहत—
“हम यहाँ किछु करि सकैत छी।”
किएक तँ संस्कृति केवल पुस्तक में नहि बचैत।
संस्कृति लोकक जीवन में बचैत अछि।
अगर गाँव खाली होइत गेल, तँ केवल घर खाली नहि होयत।
लोकगीत के श्रोता कम होयत।
पुरान बोली कम सुनाई देत।
कई पारंपरिक काम बंद होयत।
बुजुर्गक ज्ञान अगिला पीढ़ी तक कम पहुँचत।
पर्वक तरीका बदलत।
एहि कारण migration के चर्चा केवल आर्थिक विषय नहि अछि।
ई सांस्कृतिक विषय सेहो अछि।
सुबह खेत में आधुनिक मशीन चलि रहल अछि।
घर में Wi-Fi अछि।
बच्चा online class करैत अछि।
माय आँगन में मैथिली में बात करैत छथि।
बाबू खेतक हिसाब mobile में देखैत छथि।
शहर में रहनिहार बेटा सप्ताह में video call करैत अछि।
पर्व में पूरा परिवार गाँव आबैत अछि।
स्थानीय युवक online business करैत अछि।
मधुबनी painting के सामान देश के अलग-अलग शहर में भेजल जाइत अछि।
गाँव के लोक अपन संस्कृति के digital दुनिया में पहुँचा रहल छथि।
ई संभव अछि।
गाँव के भविष्य केवल अतीत में नहि अछि।
गाँव के भविष्य आधुनिक हो सकैत अछि, बिना अपन पहचान खोए।
मिथिला के गाँव छोड़ि परदेश गेल लोक के कहानी केवल पलायन की कहानी नहि अछि।
ई सपना आ मजबूरीक कहानी अछि।
ई कमाई आ परिवारक कहानी अछि।
ई शहर आ गाँव के बीच बँटल जीवनक कहानी अछि।
ई माय के इंतजारक कहानी अछि।
ई बाबू के चुप्पीक कहानी अछि।
ई बचपनक पोखरि, खेत, आँगन आ मैथिली बोलीक कहानी अछि।
कतेको लोक बाहर गेल छथि आ वहीं अपना जीवन बना लेलनि।
कतेको वापस आएल छथि।
कतेको साल में एक बेर लौटैत छथि।
कतेको केवल पर्व पर घर अबैत छथि।
कतेको मन में हमेशा गाँव बसौने छथि।
शायद एहि सबकेँ एकटा बात जोड़ैत अछि—
अपन माटि सँ रिश्ता।
मिथिला के माटि आदमी के हर समय पकड़ि नहि रखैत।
ओ कहैत अछि—
जा।
कमाउ।
सीखू।
दुनिया देखू।
अपन परिवार के बेहतर जीवन दिअ।
मुदा कहीं भीतर एकटा आवाज हमेशा रहैत अछि—
“जखन समय भेटत, घर जरूर अइहऽ।”
आ शायद यही कारण अछि कि सालों बाद जब परदेशी बेटा अपन गाँवक सड़क पर उतरैत अछि, तँ ओकर कदम अचानक धीमा भऽ जाइत अछि।
ओ चारू तरफ देखैत अछि।
किछु बदलल अछि।
किछु वैह अछि।
पुरान घर शायद वैसा नहि रहल।
पोखरि छोट भऽ गेल।
रास्ता पक्का भऽ गेल।
नयका घर बनि गेल।
मुदा हवा में किछु वैह अछि।
माटि में किछु वैह अछि।
लोकक आवाज में किछु वैह अछि।
आ आदमी मन ही मन कहैत अछि—
“हँ, ई हमर गाँव अछि।”
शायद मनुष्य कितना भी दूर चला जाए, अपना गाँव उसके भीतर से कभी पूरी तरह नहीं जाता।
परदेश आदमी के जीवन बदलि सकैत अछि, मुदा अपन माटि सँ ओकर रिश्ता बहुत मुश्किल सँ टूटैत अछि।
दादा-दादी, माय-बाबू या गाँव के बुजुर्ग सँ 10 मिनट बात करू।
“पहिने गाँव केहन छल?”—बस ई सवाल पूछू।
साल में एक बेर गाँव घुमाबू। खेत, पोखरि, पुरान घर आ रिश्तेदार सँ मिलाबू। बच्चा के केवल “गाँव” शब्द नहि, गाँवक अनुभव दिअ।
गाँवक फोटो, इतिहास, लोकगीत, पुरान घर, मंदिर, पोखरि या बुजुर्गक कहानी record करू।
आज जे चीज सामान्य लगैत अछि, 20 साल बाद वही इतिहास बनि सकैत अछि।
आप इस article में नीचे दिए गए 5–8 internal links natural जगह पर लगा सकते हैं। इससे आपका Mithila content एक-दूसरे से जुड़ेगा और reader एक article पढ़कर दूसरे पर जा सकेगा।
मैथिली भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि मिथिला की पहचान, परिवार की स्मृति और…
चौरचन की कथा क्या है? जानें चौठचंद्र की कहानी, मान्यता और मिथिला की परंपरा मिथिला…
चौरचन पर्व 2026: चौठचंद्र कब है? जानिए पूजा विधि, कथा, अरिपन, पकवान और मिथिला की…
नेपाल में इतनी भयानक बाढ़ आखिर आई कैसे? ग्लेशियर टूटने से मची तबाही की पूरी…
रक्षाबंधन 2026 के बाद आज रात क्या होगा? चंद्र ग्रहण का सच, समय और भारत…
💔 Maithili Rakhi Shayari 2026: 100+ Emotional भाई-बहिन शायरी, जो दिल छू जाए राखी का…