बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी प्रखंड में स्थित उच्चैठ भगवती स्थान मिथिला क्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध, प्राचीन और चमत्कारी शक्ति-धाम माना जाता है। यह मंदिर सिर्फ देवी उपासना का स्थान नहीं, बल्कि विद्यापति और माता काली की साक्षात कथा का जीवंत प्रमाण है।
मिथिला की मिट्टी सदियों से ज्ञान, तपस्या और आस्था की भूमि रही है। इसी भूमि में उच्चैठ गाँव स्थित है, जहाँ माँ काली ने अपने परम भक्त और प्रख्यात मैथिली कवि विद्यापति को प्रत्यक्ष दर्शन दिए थे। यही कारण है कि यह स्थान आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
यहाँ आने वाले हर भक्त की एक ही भावना होती है —
“माँ यहाँ केवल मूर्ति नहीं हैं, वे जीवित शक्ति के रूप में मौजूद हैं।”
यह लेख आपको उच्चैठ भगवती स्थान की पुरानी कहानी, इतिहास, स्थापत्य, पूजा-विधि, दर्शन, नियम, मंदिर के चमत्कार, कवि विद्यापति की कथा, वहाँ कैसे पहुँचे, पर्यटन जानकारी, और मिथिला संस्कृति में इसके महत्व के बारे में पूरी जानकारी देगा।
उच्चैठ भगवती मंदिर बिहार के मधुबनी जिले में बेनीपट्टी प्रखंड के उच्चैठ गाँव में स्थित है। यह गाँव बेनीपट्टी से लगभग 7–8 किलोमीटर दूर और जिला मुख्यालय मधुबनी से लगभग 20–25 किलोमीटर की दूरी पर है।
मंदिर एक ऊँचे टीले पर स्थित है
चारों तरफ तालाब, पेड़ और प्राकृतिक हरियाली
सड़क के दोनों ओर मिथिला कला की छाप
मंदिर के पास प्राचीन कुएँ और देवी के चमत्कारिक स्थल
यह जगह साधारण गाँव नहीं—यह मिथिला संस्कृति का जीवंत संग्रह है।
उच्चैठ का इतिहास मुख्य रूप से कवि विद्यापति से जुड़ा है। विद्यापति 14वीं शताब्दी के प्रसिद्ध मैथिली कवि थे, जिन्हें “मैथिली के सूर्य” के नाम से जाना जाता है।
कहानी के अनुसार—
विद्यापति हर दिन माता काली की उपासना करते थे। एक दिन माता उनके सामने एक साधारण ग्रामीण स्त्री के रूप में प्रकट हुईं और उन्हें कहा:
“विद्यापति, तुम मेरे परम भक्त हो। मैं तुम्हारे साथ चलूँगी। जो मांगोगे, दूँगी।”
विद्यापति उस समय अपने राजा शिवसिंह के साथ यात्रा पर थे। माता काली ने खुद को एक दासी की तरह उनके साथ रहने की अनुमति दी।
लेकिन यहाँ से शुरू हुई एक आस्था और चमत्कारों की अनोखी यात्रा।
विद्यापति के साथ काली माता “दासी” बनकर चलने लगीं। उनका नाम रखा गया —
“कंकाली”
कंकाली जो भी खाना पकाती थीं, वह दिव्य स्वाद का होता था। जो जल लाती थीं, वह अमृत जैसा शुद्ध होता था।
राजा शिवसिंह को कंकाली की असाधारण शक्तियों पर संदेह हुआ।
एक दिन यात्रा के दौरान पानी खत्म हो गया। राजा ने कंकाली से पानी लाने को कहा।
कंकाली पास के पेड़ पर गईं और लकड़ी के डंडे से ज़मीन ठोकी — और वहीं से स्वच्छ जल निकल आया।
राजा चकित हो गया।
उसने बार-बार आग्रह किया:
“हमें बताओ, तुम कौन हो?”
जब राजा ने बार-बार ज़िद की, तो विद्यापति ने कहा:
“राजन, यह कोई साधारण स्त्री नहीं हैं। यह माता काली स्वयं हैं।”
यही वह क्षण था जब काली ने अपना दिव्य रूप दिखाया।
चमकदार प्रकाश फैला।
देवी विराट स्वरूप में प्रकट हुईं।
राजा और विद्यापति दोनों स्तब्ध रह गए।
माता ने कहा—
“विद्यापति, तुमने मेरा रहस्य खोल दिया। मैं अब तुम्हारे साथ नहीं चल सकती। जहाँ खड़ी हूँ, वहीं निवास करूँगी।”
और फिर देवी उसी स्थान पर अवस्थित हो गईं।
उस स्थान को आज हम कहते हैं:
उच्चैठ मंदिर की वास्तुकला पूरी तरह मिथिला शैली में है।
ऊँचा चबूतरा
पत्थर व धातु से बनी गर्भगृह
माँ काली की विराट मूर्ति
प्रवेश द्वार पर रंगोली और मधुबनी पेंटिंग
बाहरी दीवारों पर विद्यापति–काली कथा चित्रित
प्राचीन पीपल का पेड़ — जहाँ माता ने दर्शन दिए थे
पास में पवित्र सरोवर
मंदिर में पंडितों का परिवार पीढ़ियों से पूजा कर रहा है।
माता का स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य
बाएँ पैर आगे–दाएँ पैर पीछे (प्राचीन तांत्रिक मुद्रा)
हाथों में त्रिशूल, खड्ग, कपाल और वरदान
बड़ी-बड़ी आँखें
गोल चेहरे पर तेजस्वी चमक
माथे पर सिंदूर व चंदन
पूरी मूर्ति पर शृंगार और पुष्प-मालाएँ
माता का रूप उग्र भी है, मंगलकारी भी।
आस्था है कि यहाँ माँ से जो भी सच्चे मन से माँगा जाए, वह पूरा होता है।
लोग विशेषकर—
संतान प्राप्ति
शिक्षा में सफलता
नौकरी
विवाह
रोग मुक्ति
परिवार में शांति
की मनोकामना लेकर आते हैं।
जहाँ माता खड़ी हुई थीं, उस मिट्टी में अब भी दिव्य शक्ति मानी जाती है।
वह प्राचीन कुआँ जहाँ देवी ने पानी उत्पन्न किया था, आज भी पवित्र माना जाता है।
कहा जाता है, कई भक्तों को बिना कहे ही प्रसाद मिल जाता है—जिसे माँ का संकेत माना जाता है।
सुबह मंगला आरती
दोपहर पुष्प-आरती
शाम संध्या आरती
रात्रि नित्य-भोग
दुर्गा सप्तमी, अष्टमी, नवमी
दीपावली
काली पूजा
महाशिवरात्रि
चैत्र नवरात्र
सरस्वती पूजा
विद्यापति स्मृति दिवस
नवरात्र में मंदिर में लाखों भक्त उमड़ते हैं।
मिथिला क्षेत्र की महिलाएँ लाल साड़ी, टिकुली, शृंगार और पान लेकर माता के दर्शन करती हैं।
मधुबनी (20–25 किमी)
बेनीपट्टी (7 किमी)
दरभंगा → मधुबनी → बेनीपट्टी → उच्चैठ
जयनगर → खुटौना → बेनीपट्टी → उच्चैठ
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन:
मधुबनी
दरभंगा
जयनगर
दरभंगा एयरपोर्ट (सबसे निकट)
पटना एयरपोर्ट
उच्चैठ गाँव पूरी तरह मिथिला के रंग में रंगा है।
यहाँ देखने को मिलता है:
मधुबनी पेंटिंग से रंगे घर
तालाब, कुएँ, खेत
मैथिली बोलने वाले लोग
परंपरागत भोजन: दही-चूड़ा, पुआ, घिरौनी
पारंपरिक गीत: सोहर, समा-चकेवा, मधुश्रावणी
विद्यापति ने इस स्थान को “शक्ति का निवास” कहा था।
उनके द्वारा रचित कई शक्ति स्तोत्र इसी जगह से जुड़े माने जाते हैं।
इस जगह की ऊर्जा अत्यंत शांत और दिव्य है।
कहा जाता है कि यहाँ बैठकर:
ध्यान
जाप
साधना
प्रार्थना
करने से मन और आत्मा को अद्वितीय शांति मिलती है।
यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि:
ऐतिहासिक स्थल
सांस्कृतिक धरोहर
प्राचीन वास्तुकला
मिथिला जीवनशैली
प्राकृतिक सुंदरता
का संगम है।
पर्यटक यहाँ के पास स्थित अन्य स्थलों को भी देख सकते हैं:
बेनीपट्टी का विद्यापति टॉवर
सौराठ सभा
झंझारपुर का हनुमान स्थान
राजनगर का महल
गाँव वालों के अनुसार:
रात में कई बार माता के कदमों की ध्वनि सुनाई देती है।
कई भक्तों ने सपने में माता को देखा है।
माता किसी न किसी रूप में हमेशा संरक्षण देती हैं।
यदि एक वाक्य में कहें—
यहाँ:
माता काली ने साक्षात दर्शन दिए
कवि विद्यापति का इतिहास दर्ज है
भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं
मंदिर एक शक्तिपीठ जैसा अनुभव देता है
मिथिला संस्कृति का सार समाया है
यह जगह सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि जीवित कहानी है—भक्ति, प्रेम और शक्ति की।
12वीं पास करने के बाद हर युवा के मन में एक ही सपना होता है…
📑 Table of Contents (TOC-Ready) भूमिका पहला गाना लॉन्च करना क्यों अहम है गाना चुनने…
आज का युवा मेहनती है, पढ़ा-लिखा है, लेकिन फिर भी नौकरी के लिए दर-दर भटक…
मैथिली समाज में रोष, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस पटना / मधुबनी।भोजपुरी कलाकार विजय बिहारी…
आज की पढ़ाई सिर्फ डिग्री तक सीमित नहीं रह गई है। कंपनियाँ अब अनुभव (Experience)…
आज के दौर में सिर्फ डिग्री काफी नहीं है, हुनर (Skill) ही असली ताकत है।…