ठेकुआ: परंपरा, स्वाद और छठ पूजा का पवित्र प्रसाद | इतिहास, विधि और महत्व

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ठेकुआ: मिठास, परंपरा और मिथिला-पूर्वांचल की विरासत

भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति में ऐसे अनेक व्यंजन हैं जो केवल स्वाद के लिए नहीं बल्कि भावनाओं, परंपराओं और यादों के कारण भी विशेष बन जाते हैं। इन्हीं विशेष व्यंजनों में से एक है ठेकुआ—एक ऐसा पारंपरिक पकवान जो बिहार, झारखंड, यूपी के पूर्वांचल और मिथिला क्षेत्र की पहचान बन चुका है। ठेकुआ मात्र एक मिठाई नहीं, बल्कि त्योहारों की रौनक, घर की पुकार, बचपन की स्मृति और सामाजिक जुड़ाव की मीठी कड़ी है।

यह व्यंजन अपने अनोखे स्वाद, सादगी, लंबे समय तक सुरक्षित रहने की क्षमता और बिना किसी रसायन या आधुनिक उपकरणों के बनने की प्रक्रिया के कारण आज भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना दशकों पहले था। चाहे छठ व्रत हो, यात्रा पर निकलना हो, बच्चों के लिए घर का सुरक्षित स्नैक हो या पूजा-पाठ का प्रसाद—ठेकुआ हर जगह अपनी खास पहचान बनाए रखता है।

इस विस्तृत लेख में हम ठेकुआ से जुड़ी उसकी उत्पत्ति, उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक भूमिका, बनाने की विधि, क्षेत्रीय विविधताएँ, आधुनिक परिवर्तनों, स्वास्थ्य लाभ, और समाज में इसके महत्व पर गहराई से चर्चा करेंगे।


1. ठेकुआ क्या है?

ठेकुआ एक पारंपरिक मिठाई है जिसे मुख्यतः गेहूं के आटे, गुड़ (या चीनी), देसी घी, सौंफ और इलायची के मिश्रण से बनाया जाता है। इसे तवे या कड़ाही में तलकर तैयार किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, इसलिए पहले के समय में लोग इसे लंबी यात्राओं पर ले जाते थे।

इसके आकार में भी विशेषता है—कई घरों में ठेकुआ को हाथों से दबाकर विशेष पैटर्न बनाया जाता है, तो कहीं लकड़ी के साँचे (मोल्ड) का उपयोग कर सुंदर आकृतियाँ बनाई जाती हैं। यही वजह है कि ठेकुआ न सिर्फ स्वादिष्ट होता है, बल्कि देखने में भी आकर्षक दिखता है।


2. ठेकुआ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ठेकुआ की परंपरा बहुत पुरानी है। लोककथाओं और वृद्धजन के अनुसार, यह व्यंजन सैकड़ों वर्ष पहले से बनता आया है, जब न तो चीनी व्यापक थी और न ही आधुनिक मिठाइयों का चलन था। ग्रामीण समाज में:

  • गुड़ सबसे शुद्ध मीठा माना जाता था

  • गेहूं और देसी घी आम खाद्य सामग्री थी

  • और खाने को सुरक्षित रखने का तरीका कम था

इस वजह से ऐसे नाश्ते की जरूरत होती थी जो स्वस्थ, टिकाऊ और यात्रा-अनुकूल हो—ठेकुआ ने इस जरूरत को पूरी तरह पूरा किया।

यही कारण है कि यह न केवल घरों की रसोई में बल्कि लोकगीतों, पर्व-उत्सवों और सामाजिक रीतियों में भी शामिल हो गया।


3. ठेकुआ और छठ पर्व का अटूट संबंध

यदि भारत के किसी एक त्योहार को ठेकुआ का सबसे बड़ा परिचय माना जाए, तो वह है छठ पूजा। इस पवित्र अनुष्ठान में ठेकुआ को ‘प्रसाद’ का स्थान प्राप्त है।

क्यों महत्वपूर्ण है ठेकुआ छठ में?

  1. सात्विक व्रत भोजन—छठ व्रत में बिना नमक, बिना लहसुन-प्याज, बिना रसायन और शुद्ध सामग्री का उपयोग अनिवार्य है। ठेकुआ बिल्कुल प्राकृतिक सामग्रियों से बनता है।

  2. माता-छठ (उषा-प्रभा) के प्रति आस्था—ठेकुआ को फल-फूल की तरह ही पवित्र माना जाता है और इसे सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद व्रती स्वयं ग्रहण करते हैं।

  3. दीर्घ स्थायित्व—पूजास्थल तक ले जाना, कई बार यात्रा से होकर गुजरना—ठेकुआ लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।

  4. सामाजिक एकता का प्रतीक—छठ पूजा में पूरे परिवार के सदस्य एक साथ बैठकर ठेकुआ बनाते हैं, जो एकता और सामूहिकता का सुंदर उदाहरण है।

इसका महत्व इतना गहरा है कि छठ का नाम आते ही सबसे पहले ठेकुआ और केले के पत्ते की टोकरी की छवि सामने आ जाती है।


4. ठेकुआ का धार्मिक महत्व

ठेकुआ केवल स्वाद नहीं, बल्कि इसके पीछे धार्मिक मान्यता भी है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार:

  • गुड़ से बना प्रसाद भगवान को अत्यंत प्रिय माना जाता है

  • आटे में ‘पृथ्वी’ का प्रतीक

  • घी ‘पवित्रता’ का

  • और सौंफ व इलायची ‘शुद्धता’ और ‘सुगंध’ का संकेत देती हैं

इस प्रकार ठेकुआ पंचतत्वों का संतुलित रूप माना गया है।

इसी कारण इसे पूजा-पाठ, नवसुवात (नए काम की शुरुआत), यात्रा, शुभ कार्य और परिवार की मंगलकामना के प्रतीक रूप में भी बनाया जाता है।


5. ठेकुआ बनाने की पारंपरिक विधि

हालाँकि प्रत्येक क्षेत्र और परिवार की विधि थोड़ी अलग होती है, लेकिन पारंपरिक विधि लगभग समान रहती है।

मुख्य सामग्री:

  • गेहूं का आटा

  • गुड़ या शक्कर

  • देसी घी

  • सौंफ

  • इलायची

  • नारियल किसा हुआ (कुछ जगह वैकल्पिक)

  • पानी

बनाने की प्रक्रिया:

  1. गुड़ घोलना — सबसे पहले गुड़ को गर्म पानी में घोलकर छान लिया जाता है ताकि उसकी अशुद्धियाँ हट जाएँ।

  2. घी और आटे का मेल — आटे में घी डाला जाता है और इसे ‘मोयन’ कहा जाता है। यही मोयन ठेकुआ को कुरकुरा और स्वादिष्ट बनाता है।

  3. मसाले मिलाना — सौंफ, इलायची और नारियल डालकर आटा तैयार किया जाता है।

  4. आटा गूँथना — गुड़ के पानी से आटा सख्त गूँथा जाता है।

  5. आकृति बनाना — आटे की लोइयाँ बनाकर हाथों या लकड़ी के सांचे से डिजाइन बनाई जाती है।

  6. तलना — मध्यम आंच पर धीरे-धीरे ठेकुआ तला जाता है ताकि वह अंदर तक अच्छी तरह पक जाए।

गरम तेल में ठेकुआ से उठती मीठी महक पूरे घर और मोहल्ले में फैल जाती है।


6. ठेकुआ की क्षेत्रीय विविधताएँ

भारत के कई क्षेत्रों में ठेकुआ के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।

1. बिहारी ठेकुआ

  • पारंपरिक

  • गुड़ की मिठास

  • कड़क और क्रिस्पी

2. मिथिला ठेकुआ

  • स्वाद में थोड़ा हल्का

  • कभी-कभी इसमें चावल का आटा भी मिलाया जाता है

  • डिज़ाइन और पैटर्न पर ज्यादा ध्यान

3. भोजपुरी क्षेत्र का ठेकुआ

  • आकार में बड़ा

  • नारियल और खसखस का प्रयोग

  • अधिक मिठास

4. झारखंडी ठेकुआ

  • देसी घी कम, तेल का उपयोग

  • मसालों का प्रयोग कम

यह विविधताएँ दर्शाती हैं कि ठेकुआ एक ही नहीं, बल्कि कई स्वरूपों में लोगों की पसंद का हिस्सा है।


7. ठेकुआ के स्वास्थ्य लाभ

हालांकि यह एक मिठाई है, परंतु घर में बने ठेकुआ में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं।

1. ऊर्जा का उत्कृष्ट स्रोत

गुड़ + घी + गेहूं → शरीर को तेज ऊर्जा प्रदान करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में किसान खेतों में काम करने से पहले इसे खाते थे।

2. पाचन में सहायक

सौंफ और इलायची पाचन को सुधारे हैं और भारी भोजन के बोझ को कम करते हैं।

3. रसायन-मुक्त स्नैक

बाजार के पैकेट वाले स्नैक्स की तुलना में ठेकुआ 100% प्राकृतिक है।

4. लंबे समय तक सुरक्षित

यह सुरक्षित रूप से 10–12 दिनों तक चलता है। यात्रा के लिए सर्वोत्तम।

5. प्रतिरक्षा बढ़ाने वाला

गुड़ खून को शुद्ध करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।


8. सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

ठेकुआ का सामाजिक महत्व बेहद गहरा है।

परिवार की एकता

छठ के समय पूरा परिवार एक साथ बैठकर ठेकुआ बनाता है—इस प्रक्रिया में बातचीत, हँसी, गीत और एकता सब कुछ शामिल होता है।

पड़ोसी प्रेम और सामाजिक जुड़ाव

कई घरों में छठ प्रसाद बनने पर इसे पड़ोसियों में भी बांटा जाता है।

बचपन की यादें

पारंपरिक रसोई में माँ और दादी के हाथों से बना ठेकुआ बच्चे कभी भूल नहीं पाते।


9. ठेकुआ और आधुनिकता

आज के समय में जहाँ फास्ट फूड और इंस्टेंट स्नैक्स का चलन बढ़ा है, वहीं ठेकुआ ने अपनी पहचान को और भी मजबूत किया है।

ऑनलाइन बिक्री

आज कई स्टार्टअप, किचन ब्रांड और ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म ठेकुआ को पैकेज्ड प्रोडक्ट के रूप में बेच रहे हैं।

सेहत-प्रिय लोगों के लिए विकल्प

  • बेक्ड ठेकुआ

  • शुगर-फ्री ठेकुआ

  • मल्टीग्रेन ठेकुआ

  • बिना घी वाला ठेकुआ

ये सब नए जमाने की माँग के अनुसार बदले हुए रूप हैं।


10. लोकगीतों में ठेकुआ

भोजपुरी और मैथिली लोकगीतों में ठेकुआ का कई बार उल्लेख मिलता है।
छठ के गीत—
“कांचा ही बांचा ठेकुआ, छठी मईया के अंजोरिया…”
जैसे गीत इसकी पवित्रता और लोकप्रियता को दर्शाते हैं।


11. पर्यटन और ठेकुआ

बिहार सरकार ने भी ठेकुआ को पर्यटन में प्रमोट करने की पहल की है।
छठ पूजा के समय देश-विदेश से लोग बिहार और मिथिला आते हैं, जहाँ ठेकुआ सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में पहचान रखता है।


12. निष्कर्ष

ठेकुआ केवल एक व्यंजन नहीं बल्कि संस्कृति, परंपरा, आस्था, मिठास और परिवार की एकता का प्रतीक है। यह पीढ़ियों को जोड़ने वाला ऐसा स्वाद है, जो आधुनिकता के इस तेज़ दौर में भी अपनी जगह मजबूती से बनाए हुए है।

इसकी सादगी, शुद्धता और प्यार भरी तैयारी इसे खास बनाती है। चाहे त्योहारों की रौनक हो या यादों का खजाना—ठेकुआ हर किसी के जीवन में एक मधुर स्थान रखता है।

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