आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया एक ऐसे संकट से गुजर रही है, जिसे अभी पूरी तरह पहचाना भी नहीं गया है। यह संकट है – बच्चों में मोबाइल और डिजिटल स्क्रीन की बढ़ती लत।
अक्सर इस समस्या का दोष माता-पिता, स्कूल या बच्चों पर डाल दिया जाता है, लेकिन एक बहुत बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है:
क्या सरकार और पूरा सिस्टम अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है?
जब सड़क दुर्घटनाएं बढ़ती हैं, तो सरकार हेलमेट और सीट बेल्ट को अनिवार्य करती है।
जब तंबाकू से नुकसान होता है, तो उस पर चेतावनी लिखी जाती है।
लेकिन जब मोबाइल बच्चों का बचपन छीन रहा है, तब सरकार और सिस्टम चुप क्यों हैं?
किसी भी देश में सरकार का सबसे बड़ा दायित्व होता है – भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा।
बच्चे ही देश का भविष्य होते हैं, लेकिन आज वही भविष्य मोबाइल स्क्रीन के पीछे कैद होता जा रहा है।
सरकार की जिम्मेदारी केवल इंटरनेट सस्ता करना या डिजिटल इंडिया का प्रचार करना नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि:
बच्चे डिजिटल दुनिया के शिकार न बनें
तकनीक बच्चों के विकास का साधन बने, विनाश का कारण नहीं
मुनाफे से ज्यादा प्राथमिकता मानसिक स्वास्थ्य को दी जाए
भारत में Digital India अभियान को ऐतिहासिक सफलता मिली है।
आज गांव-गांव में इंटरनेट है, स्मार्टफोन है, ऑनलाइन शिक्षा है।
लेकिन सवाल यह है:
👉 क्या हमने “Childhood India” की कीमत पर Digital India खड़ा किया है?
जहाँ एक तरफ डिजिटल सुविधाएँ बढ़ीं, वहीं दूसरी तरफ:
बच्चों का शारीरिक खेल खत्म होता गया
सामाजिक संवाद कम होता गया
आंखों, दिमाग और नींद की समस्याएं बढ़ती गईं
सरकार ने डिजिटल विकास को तो तेज़ी से अपनाया, लेकिन डिजिटल सुरक्षा नीति को पीछे छोड़ दिया।
आज भी भारत में:
बच्चों के मोबाइल उपयोग की कोई कानूनी समय सीमा नहीं
मोबाइल गेम्स के लिए सख्त उम्र नियम नहीं
सोशल मीडिया कंपनियों पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं
जबकि कई विकसित देशों में:
13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित है
गेम्स में “Screen Time Warning” अनिवार्य है
बच्चों के डेटा की सुरक्षा पर कड़े कानून हैं
भारत में सरकार ने अभी तक Child Digital Protection Act जैसा कोई सशक्त कानून नहीं बनाया।
सरकार के अधीन आने वाली शिक्षा व्यवस्था भी इस समस्या में बड़ी भूमिका निभाती है।
कोरोना के बाद ऑनलाइन पढ़ाई को स्थायी विकल्प बना दिया गया।
लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि:
छोटे बच्चों को घंटों स्क्रीन के सामने बैठाना कितना खतरनाक है
पढ़ाई और मनोरंजन की सीमा बच्चों के लिए मिट जाती है
मोबाइल पढ़ाई के बहाने बच्चों का सबसे करीबी दोस्त बन जाता है
स्कूल सिस्टम ने बच्चों को यह नहीं सिखाया कि:
मोबाइल का सीमित और सुरक्षित उपयोग कैसे करें
डिजिटल अनुशासन क्या होता है
स्क्रीन से दूरी क्यों जरूरी है
यह एक कड़वा सच है कि:
सरकार और बड़ी टेक कंपनियों के बीच मौन समझौता सा नजर आता है
मोबाइल कंपनियां सस्ते फोन बेचती हैं
गेमिंग कंपनियां बच्चों को टारगेट करती हैं
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों के डेटा से कमाई करते हैं
लेकिन सरकार की ओर से:
न कोई सख्त निगरानी
न कोई प्रभावी नियंत्रण
न कोई सार्वजनिक चेतावनी अभियान
बच्चों की मासूमियत बड़े मुनाफे का साधन बन चुकी है।
टीवी और मोबाइल पर चलने वाले विज्ञापनों में:
बच्चों को सीधे टारगेट किया जाता है
गेम्स को “Fun” और “Cool” बनाकर दिखाया जाता है
स्क्रीन टाइम के नुकसान को कभी नहीं बताया जाता
सरकार यदि चाहे तो:
बच्चों के लिए मोबाइल विज्ञापनों पर रोक लगा सकती है
गेमिंग ऐप्स पर चेतावनी लिखवाना अनिवार्य कर सकती है
बच्चों के लिए कंटेंट रेटिंग सिस्टम सख्त बना सकती है
लेकिन अभी यह सब केवल सुझाव बनकर रह गया है।
भारत में बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य अभी भी Low Priority Issue माना जाता है।
स्कूलों में काउंसलर की कमी
सरकारी अस्पतालों में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की कमी
मानसिक समस्याओं पर सामाजिक चुप्पी
सरकार अगर चाहती तो:
हर स्कूल में डिजिटल हेल्थ काउंसलिंग अनिवार्य कर सकती थी
मोबाइल लत को “मानसिक स्वास्थ्य समस्या” घोषित कर सकती थी
अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम चला सकती थी
लेकिन सिस्टम की सुस्ती बच्चों पर भारी पड़ रही है।
अक्सर सरकार और सिस्टम यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि:
“यह माता-पिता की जिम्मेदारी है”
बिल्कुल सही, माता-पिता की भूमिका अहम है।
लेकिन सवाल यह है:
जब सरकार शराब, तंबाकू और ड्रग्स को नियंत्रित कर सकती है
तो बच्चों के लिए मोबाइल को क्यों नहीं?
एक अकेला परिवार बड़ी टेक कंपनियों और डिजिटल जाल से नहीं लड़ सकता।
यह लड़ाई नीति, कानून और सिस्टम के स्तर पर लड़ी जानी चाहिए।
अगर सरकार और सिस्टम सच में बच्चों को बचाना चाहते हैं, तो उन्हें ये कदम उठाने होंगे:
उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम की सीमा तय की जाए
इसका उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर जुर्माना हो
मोबाइल-फ्री स्कूल कैंपस
डिजिटल जागरूकता पाठ्यक्रम
बच्चों को टारगेट करने वाले एल्गोरिदम पर रोक
गेम्स में अनिवार्य ब्रेक अलर्ट
जैसे पोलियो या स्वच्छ भारत अभियान
वैसे ही “Save Childhood Campaign”
आज का बच्चा कल का नागरिक है।
अगर वही बच्चा:
चिड़चिड़ा
एकाकी
स्क्रीन-आधारित
मानसिक रूप से कमजोर
बन गया, तो देश की सामाजिक नींव हिल जाएगी।
यह सिर्फ एक परिवार या स्कूल की समस्या नहीं है।
यह राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
मोबाइल ने बच्चों से बचपन छीना है, इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन यह चोरी अकेले मोबाइल ने नहीं की।
इसमें शामिल हैं:
सरकार की ढिलाई
सिस्टम की चुप्पी
कानूनों की कमी
और मुनाफे की राजनीति
अब समय आ गया है कि:
सरकार, सिस्टम और समाज मिलकर बच्चों का बचपन वापस दिलाएं
क्योंकि अगर बचपन ही नहीं बचेगा,
तो Digital India का भविष्य भी नहीं बचेगा।
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