मिथिला पेंटिंग, जिसे दुनिया भर में मधुबनी पेंटिंग के नाम से भी जाना जाता है, भारत की सबसे प्राचीन, रंगीन और पारंपरिक कला शैलियों में से एक है। यह केवल चित्रकारी नहीं, बल्कि मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा, लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं और जीवन दर्शन की जीवंत अभिव्यक्ति है। सदियों पुरानी यह कला आज भी अपनी ताजगी, रंगों और गहराई के कारण वैश्विक मंच पर सम्मान पा रही है। इस कला ने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाई है और आज यह वैश्विक बाजार में सबसे लोकप्रिय लोक–कला रूपों में शामिल है।
इस लेख में हम मिथिला पेंटिंग के इतिहास, विकास, शैली, प्रकार, तकनीक, विषय-वस्तु, कलाकारों, उद्योग, आधुनिक रूपांतरण और वैश्विक प्रभाव आदि पर विस्तृत जानकारी देंगे।
मिथिला पेंटिंग का इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। रामायण के अनुसार, राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के अवसर पर पूरे मिथिला राज्य में दीवारों को सुशोभित करने का आदेश दिया था। उस समय महिलाओं ने घरों की दीवारों, आंगन और कुटिया पर सुंदर-सुंदर चित्र बनाए। वही शैली आगे चलकर मधुबनी / मिथिला पेंटिंग के नाम से प्रचलित हुई।
पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि यह कला प्राचीन वैदिक काल से मौजूद है। शुरुआत में इसे दीवारों, फर्श (अरिपन), खपड़ियों और मिट्टी पर बनाया जाता था। बाद में कैनवास, कपड़े और कागज पर भी इसका विस्तार हुआ।
मिथिला पेंटिंग मुख्यतः मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, सुपौल, मधेपुरा, समस्तीपुर और सहरसा क्षेत्रों में विकसित हुई।
मिथिला पेंटिंग सदियों तक महिलाओं की कला रही है। घर-घर में यह परंपरा माँ से बेटी तक जाती रही।
यह केवल चित्र ही नहीं, बल्कि—
मंगल अवसरों की सजावट
देवी-देवताओं की पूजा
विवाह संस्कार
त्योहारों की पहचान
सामाजिक संदेश
का माध्यम भी रही है।
मिथिला की महिलाएँ इस कला को अपनी भावनाओं, अनुभवों और संस्कृति की भाषा मानती रही हैं। यही कारण है कि मिथिला पेंटिंग आज भी जीवंत है और विश्व में सम्मानित है।
मधुबनी / मिथिला पेंटिंग की कुछ खास विशेषताएँ इसे अन्य कला शैलियों से अलग करती हैं—
रंग बनाने में चावल का घोल, हल्दी, लाल मिट्टी, पौधों और फूलों के अर्क का उपयोग होता था।
चित्र की outlines दोहरी रेखाओं से बनती हैं। बीच के स्थानों को जटिल पैटर्न जैसे—मछली, कमल, पत्ते, ज्यामितीय डिज़ाइन—से भरा जाता है।
मिथिला पेंटिंग में खाली स्थान (Blank Space) कभी नहीं छोड़ा जाता।
राम-सीता, कृष्ण-राधा, शिव–पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती आदि मुख्य विषय होते हैं।
सूरज, चाँद, मछली, पेड़, पक्षी, पशु, नदी, कमल आदि प्रकृति के प्रतीक इस कला के केंद्र में होते हैं।
नारियल, बांस, कपड़ा, घास और लकड़ी से ब्रश तैयार किए जाते थे।
मधुबनी पेंटिंग मुख्यतः पाँच प्रमुख शैलियों में बनाई जाती है—
इस शैली में देवी-देवताओं के चित्र, विवाह दृश्य और धार्मिक विषय बनाए जाते हैं। रंग भरने में चमकीले रंग प्रयोग होते हैं।
यह शैली भी भरनी जैसी है, लेकिन इसमें रेखाओं और फाइन पैटर्न पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
काली या भूरी स्याही का उपयोग। रंग कम और सूक्ष्म रेखाएँ अधिक।
यह सबसे सुसंस्कृत और परिष्कृत शैली मानी जाती है।
जनजातीय शैली। इसमें शरीर टैटू (गोदना) पैटर्न का उपयोग होता है।
आदिवासी जीवन, प्रकृति और प्रतीकात्मक चित्र मुख्य रूप से शामिल।
इस शैली में देवी तंत्र, यंत्र, अगमनीय देवी-देवता और प्रतीकात्मक आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
यह आध्यात्मिक और गूढ़ शैली है।
मिथिला पेंटिंग केवल कला नहीं, बल्कि जीवन का संपूर्ण दर्शन है।
इसमें मुख्यतः निम्न विषय शामिल होते हैं—
राम–सीता विवाह
कृष्ण–राधा लीला
दुर्गा पूजा
शिव-विष्णु
गणेश
सरस्वती और लक्ष्मी
विवाह परंपरा
नाचे–गाए गीत
सामूहिक त्योहार
मछली पकड़ना
खेती और ग्रामीण जीवन
पेड़–पौधे
सूरज–चाँद
कमल
मछली (समृद्धि का प्रतीक)
पक्षी और जीव-जंतु
मिथिला की महिलाओं ने अपने जीवन अनुभव, भावनाएँ और संघर्षों को कलात्मक रूप से दर्शाया है।
पहले कागज, कैनवास या दीवार की सतह को चावल के घोल से लेपित किया जाता है।
बांस के कलम, लकड़ी या कपड़े की नोक से चित्र की रूपरेखा बनाई जाती है।
पहले हल्के रंग, फिर गहरे रंग भरे जाते हैं।
खाली स्थानों को पत्ती, फूल, मछली, ज्यामितीय आकारों से भरा जाता है।
अंत में डबल लाइन और पैटर्न की बॉर्डर बनाई जाती है।
मिथिला पेंटिंग को आज विश्व प्रसिद्ध बनाने में कई कलाकारों का योगदान है—
सीता देवी (पद्मश्री)
गंगा देवी (पद्मश्री)
महासुंदरी देवी (पद्मश्री)
जगदम्बा देवी
भैरव मिश्रा
बऊआ देवी
भातो देवी
गुलजार देवी
दुलारी देवी
इनकी मेहनत से यह कला विश्व के संग्रहालयों और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में शामिल हुई।
आज मिथिला पेंटिंग एक बड़ा उद्योग बन चुकी है।
हजारों महिलाएँ और युवा इससे घर बैठे कमाई कर रहे हैं।
अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में इसकी भारी मांग है।
सरकार ART हब, ट्रेनिंग सेंटर और GI Tag के माध्यम से कलाकारों को बढ़ावा देती है।
ऑनलाइन मार्केटप्लेस (Etsy, Amazon, Meesho आदि) ने कलाकारों की आमदनी बढ़ाई है।
आज यह कला—
टी-शर्ट
बैग
मोबाइल कवर
गिफ्ट आइटम
ड्रेस
वॉल पेंटिंग
होम डेकोर
पर भी बनाई जा रही है।
कॉर्पोरेट ऑफिस, कैफे, स्टूडियो और बड़े होटल भी इसे सजावट में उपयोग करते हैं।
मिथिला पेंटिंग केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवित और विकसित होती कला है।
आज युवा कलाकार आधुनिक डिज़ाइन के साथ इसे ग्लोबल ब्रांड बना रहे हैं।
अगर इसी तरह प्रोत्साहन मिलता रहा तो आने वाले समय में यह कला दुनिया की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान बन जाएगी।
मिथिला पेंटिंग भारतीय संस्कृति का अनमोल रत्न है। यह कला केवल रंग और रूपों का संयोजन नहीं, बल्कि मिथिला की परंपरा, भावनाओं, आस्था और जीवन का प्रतिबिंब है।
इसकी सबसे खास बात यह है कि यह सदियों पुरानी होने के बावजूद आज के समय में भी समान रूप से लोकप्रिय और उपयोगी है।
मिथिला पेंटिंग वह धरोहर है, जिसे जितना देखा जाए, उतना ही नया अनुभव मिलता है।
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