एक गहरी पड़ताल, सामाजिक सच्चाई और नई उम्मीदों की कहानी
मैथिली—भारत की प्राचीन, समृद्ध और अत्यंत मधुर भाषाओं में से एक। यह सिर्फ बोलियों का समूह नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता की धड़कन है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पूर्व “विदेह साम्राज्य” तक फैली हुई हैं। इस भाषा में जनक–सीता की परंपरा, याज्ञवल्क्य का ज्ञान और विद्यापति की मिठास एक साथ बहती है। परंतु आज, समय के बदलते प्रवाह में, यही भाषा एक सवाल के घेरे में खड़ी है—क्या मैथिली अपना अस्तित्व बनाए रख पाएगी?
यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं, बल्कि एक पूरी संस्कृति, एक पहचान, एक भावनात्मक संसार का प्रश्न है। इस लेख में हम उसी संकट और उसके भविष्य की संभावनाओं को विस्तृत रूप में समझेंगे।
मैथिली के सामने संकट नया नहीं है। परंतु इसकी तीव्रता पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ी है। पहले लोग गांवों में घर-परिवार में मैथिली बोलते थे, बच्चा बोलना सीखता ही मैथिली से था। आज यह दृश्य तेजी से बदल रहा है।
जैसे-जैसे लोग शहरों की ओर बढ़े, नई भाषाएँ—विशेषकर हिंदी—प्रमुख होने लगीं।
स्कूल में हिंदी
ऑफिस में हिंदी या अंग्रेज़ी
समाज में “हिंदी बोलो तो समझ में आएगा” का दबाव
इससे मैथिली पीछे छूटती चली गई।
आज कई माता-पिता बच्चों से हिंदी में बात करते हैं।
कारण?
“बच्चा हकलाएगा न कहकर…”
“हिंदी–अंग्रेज़ी अच्छी होनी चाहिए…”
“मैथिली बोलने से क्या फायदा?”
यही सोच धीरे-धीरे भाषा को कमजोर कर रही है।
बच्चों का संपर्क सोशल मीडिया, OTT, गेम्स और बाहरी कंटेंट से अधिक है।
इन सभी में मैथिली कंटेंट की कमी है।
जिससे बच्चे–युवा दोनों भाषाई रूप से हिंदी और अंग्रेज़ी की ओर झुक गए।
गांवों में भी अब मिश्रित भाषा का उपयोग बढ़ रहा है।
कई बच्चे मैथिली में पूरा वाक्य नहीं बना पाते।
यह चिंताजनक संकेत है।
जब घर में भाषाएँ बदल जाती हैं,
तो संस्कार, कहानियाँ, गीत, संस्कृति भी बदल जाती है।
उदाहरण के
लिए:
पहले बच्चा “आमचोर” जानता था,
अब सिर्फ “अचार” जानता है।
पहले “पगड़ी” थी,
अब “कप” बन गया।
भाषा बदलने से पहचान का मूल रंग फीका होने लगता है।
मैथिली वह भाषा है जिसमें—
✔ कन्यादान के गीत गाए जाते हैं
✔ सामा–चकेबा की परंपरा निभाई जाती है
✔ कोहबर की पेंटिंग बनती है
✔ मधुर लोकगीत सदियों की विरासत का परिचय देते हैं
जब हम मैथिली नहीं बोलते—
तो सिर्फ शब्द नहीं खोते,
हम भावनाएँ खोते हैं।
विद्यापति की पंक्तियाँ—
“पिय संग खेलब हो अवधिया…”
सिर्फ कविता नहीं, पूरी संस्कृति की आत्मा है।
अधिकांश स्कूलों में मैथिली वैकल्पिक विषय के रूप में भी उपलब्ध नहीं।
भाषा जब शिक्षा से गायब हो जाती है,
धीरे-धीरे उसकी लोकप्रियता खत्म होने लगती है।
यद्यपि मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला,
फिर भी सरकारी स्तर पर
प्रचार की कमी
पाठ्यक्रम का अभाव
प्रशासनिक भाषा के रूप में उपयोग न होना
इस संकट को और बढ़ाता है।
आज युवा रोजगार की तैयारी में हिंदी–अंग्रेज़ी पर ध्यान देते हैं।
करियर ओरिएंटेशन ने मातृभाषा को हाशिये पर डाल दिया है।
पिछले 10–15 वर्षों तक मैथिली कंटेंट बहुत कम था—
टीवी चैनल नहीं
कार्टून नहीं
न्यूज़ कम
सीरियल लगभग न के बराबर
OTT प्लेटफॉर्म पर शून्य
इसने युवा पीढ़ी का भाषा से भावनात्मक संबंध कमजोर किया।
लेकिन अब हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं।
संकट के बीच कई उजली किरणें भी दिख रही हैं।
यूट्यूब पर मैथिली गीतों ने बड़ी जगह बनाई
कई नए कलाकार सामने आए
लोकगीत से लेकर आधुनिक गीत तक सब लोकप्रिय हुए
“Jai Mithila Music” जैसे ब्रांड युवाओं में पहचान बना रहे हैं
यह भाषा को जीवित रखने का बड़ा आधार है।
फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, यूट्यूब पर
मिथिला संस्कृति और मैथिली भाषा को लेकर हजारों पेज सक्रिय हैं।
लोग गर्व से लिखते हैं—
“हम मैथिली छियै।”
अब कई युवा अपनी जड़ों को खोज रहे हैं।
पाग पहनना
मिथिला आर्ट सीखना
मैथिली रील्स बनाना
लोकगीतों को रीमिक्स करना
यह एक नया सांस्कृतिक रिवाइवल है।
हाल में मैथिली को राजनीतिक चर्चा और सांस्कृतिक मंचों पर जगह मिल रही है।
इससे भाषा को नया सम्मान मिल रहा है।
यदि मैथिली को
स्कूलों में स्थान मिले
परिवार में बोली जाए
मीडिया में बढ़ावा मिले
साहित्य और गीतों को सपोर्ट मिले
तो मैथिली आने वाले 50 वर्षों तक अत्यंत मजबूत बन सकती है।
दुनिया में 3000 से अधिक भाषाएँ खत्म हो चुकी हैं।
कई भाषाएँ हर साल विलुप्त हो जाती हैं।
यदि मैथिली पर ध्यान नहीं दिया गया,
तो यह भी “एंडेंजर्ड लैंग्वेज” बन सकती है।
बच्चों से मैथिली में बात करें
दादी-नानी की कहानियाँ मैथिली में सुनाएँ
परिवारिक कार्यक्रमों में मैथिली गीत गाएँ
मैथिली को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल किया जाए
कॉलेज में मैथिली साहित्य को बढ़ावा दिया जाए
मैथिली कार्टून
वेब सीरीज़
शॉर्ट फिल्में
बच्चों के लिए स्टोरी वीडियो
संगीत एल्बम
यही कंटेंट युवा पीढ़ी को भाषा से जोड़ेगा।
मैथिली में मोबाइल ऐप
मैथिली कीबोर्ड
मैथिली विकिपीडिया
ऑनलाइन मैथिली कोर्स
यह भाषा को ग्लोबल पहुँच देगा।
सामा-चकेबा
छठ
विवाह-गीत
कोहबर आर्ट
इन पर आधारित इवेंट युवाओं में भाषा का गर्व बढ़ाते हैं।
भाषा सिर्फ बोली नहीं जाती—
वह जीवन में जी जाती है।
मैथिली को कोई सरकार, संस्था या कानून नहीं बचा सकता,
जब तक इसके लोग इसे
अपने दिल और घरों में न बसाएँ।
भविष्य कैसा होगा—
यह इस बात पर निर्भर करता है कि
आज की पीढ़ी अपनी पहचान को
कितना संजोकर रखती है।
मैथिली का भविष्य संकट के मुहाने पर खड़ा है,
परंतु इसमें जीवित रहने की ताकत आज भी भरपूर है।
भाषा बनी रहेगी—
अगर हम बोलेंगे।
संस्कृति जीवित रहेगी—
अगर हम अपनाएँगे।
पहचान चमकेगी—
अगर हम गर्व से कहेंगे—
“हम मैथिल छी, और हमर भाषा मैथिली छइ।”
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