मधुश्रावणी मिथिला क्षेत्र का एक अत्यंत पवित्र, सांस्कृतिक और पारंपरिक पर्व है, जिसे मुख्य रूप से नवविवाहित महिलाएँ मनाती हैं। यह पर्व पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास, दीर्घायु और वैवाहिक जीवन की मजबूती का प्रतीक माना जाता है। मधुश्रावणी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मिथिला समाज की सदियों पुरानी परंपराओं, कहानियों और लोकविश्वासों से जुड़ा हुआ उत्सव है।
इसका आरंभ श्रावण मास में होता है और यह लगभग 13 से 15 दिनों तक चलने वाला बड़ा पर्व है। विशेष रूप से बिहार के मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा, सुपौल, कटिहार तथा नेपाल के तराई क्षेत्र में इसे बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
“मधुश्रावणी” दो शब्दों से बना है—
मधु = मीठा, शुभ, सौभाग्य
श्रावणी = श्रावण मास में आने वाला पवित्र पर्व
यह व्रत नवविवाहित दंपतियों के लिए बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि जो महिलाएँ यह व्रत करती हैं, उनके वैवाहिक जीवन में सुख, समृद्धि, प्रेम और सुरक्षा बनी रहती है। पति की आयु लंबी होती है और दांपत्य जीवन में किसी प्रकार का संकट नहीं आता।
इस व्रत के पीछे अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू जुड़े हैं—
पार्वती और शिव की कथा – माना जाता है कि देवी पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए कठिन तप किया था। उनकी तपस्या, धैर्य और प्रेम का प्रतीक यह व्रत माना जाता है।
सर्प पूजा का महत्व – श्रावण मास नागों का महीना माना जाता है। इसीलिए मधुश्रावणी में नाग पूजा का विशेष विधान है।
वैवाहिक बंधन की मजबूती – इस व्रत का उद्देश्य दांपत्य जीवन को खुशहाल रखना और नवविवाहित जोड़े के बीच प्रेम और विश्वास को बढ़ाना है।
मुख्य रूप से यह व्रत नवविवाहित महिलाएँ करती हैं।
लेकिन कई स्थानों पर विवाहित महिलाएँ भी इसे करती हैं ताकि उनका दांपत्य जीवन सुखमय बना रहे।
मिथिला में यह पर्व 13 से 15 दिनों तक मनाया जाता है।
पूरे व्रत के दौरान कथा, पूजा, गीत-संगीत, लोकनाट्य और घर के रीति-रिवाज़ पूरे उत्साह से किए जाते हैं।
हर दिन महिलाएँ मधुश्रावणी से जुड़ी पौराणिक कथाएँ सुनती हैं।
इन कथाओं में—
शादी
प्रेम
निष्ठा
परिवार
प्रकृति
का गहरा संदेश मिलता है।
नाग पंचमी के आसपास विशेष रूप से साँप की पूजा की जाती है।
सर्पों को रक्षा और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है।
मिथिला की महिलाएँ इस मौके पर सुंदर मधुबनी पेंटिंग, कोहबर चित्र और पूजन चौकी बनाती हैं।
इनमें—
कमल
मछली
सूर्य
चन्द्रमा
दूल्हा–दुल्हन
बांस
जैसे शुभ प्रतीक बनाए जाते हैं।
नवविवाहित दंपति को घर बुलाया जाता है और उनके स्वागत में खास भोजन और पारंपरिक गीत गाए जाते हैं।
पूजा में उपयोग होने वाली मुख्य वस्तुएँ:
दूध, दही, मधु
दूब घास
हल्दी
पान-सुपारी
मिठाई
चावल
मिट्टी की नाग प्रतिमा
यह सारी सामग्री शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक मानी जाती है।
मिथिला की महिलाएँ इस व्रत में कई मधुर बैठकी और लोकगीत गाती हैं।
गीतों में—
शिव-पार्वती
नाग देवता
दाम्पत्य जीवन
प्रकृति
का वर्णन होता है।
इन गीतों में मिथिला की संस्कृति की असली सुंदरता दिखती है।
मिथिला का यह पर्व केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। इसमें—
पूरे परिवार
पड़ोस
समुदाय
एक साथ मिलकर इस उत्सव में भाग लेते हैं।
यह त्योहार सामाजिक रिश्तों को मजबूत बनाता है और नवविवाहित लड़की को अपने नए घर व परिवार से जोड़ने में मदद करता है।
मधुश्रावणी को प्रकृति-आधारित पर्व माना जाता है। मिथिला की संस्कृति में सर्पों को कृषि और पर्यावरण का रक्षक माना गया है।
इसलिए इस दौरान—
पेड़ लगाए जाते हैं
सर्प संरक्षण का संदेश दिया जाता है
वर्षा, खेती और फसलों की समृद्धि की कामना की जाती है
अंतिम दिन महिलाएँ—
उपवास
सामूहिक पूजा
कथा
करती हैं और अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
इसके बाद विशेष भोजन (परंपरागत व्यंजन) बनाकर उत्सव मनाया जाता है।
नई पीढ़ी में भी यह पर्व तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
सोशल मीडिया, यू-ट्यूब और स्थानीय कार्यक्रमों के कारण यह त्योहार मिथिला के बाहर भी प्रसिद्धि पा चुका है।
विवाह के बाद नवविवाहित दंपति इस त्योहार को बहुत हर्षोल्लास से मनाते हैं।
मधुश्रावणी मिथिला की संस्कृति, परंपरा और वैवाहिक प्रेम का सबसे सुंदर प्रतीक है।
यह त्योहार हमें प्रेम, निष्ठा, प्रकृति, परिवार और सामाजिक एकता का संदेश देता है।
इसलिए यह पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मिथिला की आत्मा है।
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