Jitiya Vrat 2026 की पूजा करती हुई महिला
अश्विन महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी आते ही मिथिला, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया और बिहार के कई जिलों में एक अलग ही माहौल देखने को मिलता है। गांवों की गलियों से लेकर शहरों के घरों तक जितिया व्रत की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। महिलाएं पूजा की सामग्री जुटाती हैं, घर की साफ-सफाई करती हैं और परिवार के लोग भी इस पर्व की तैयारियों में उनका साथ देते हैं।
जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है, मातृत्व, विश्वास और त्याग का पर्व है। इस दिन मां अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करते हुए कठिन निर्जला व्रत रखती है। पूरे दिन और रात बिना अन्न और जल के उपवास रखना आसान नहीं होता, लेकिन अपने बच्चों के प्रति प्रेम और आस्था इस कठिन तपस्या को भी सरल बना देती है।
मिथिला की लोक संस्कृति में जितिया केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह परिवार को जोड़ने वाला उत्सव भी है। इस अवसर पर पारंपरिक गीत गाए जाते हैं, महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर पूजा की तैयारियों में सहयोग करती हैं और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।
यदि आप जानना चाहते हैं कि Jitiya Vrat 2026 कब है, पूजा कैसे करें, व्रत के नियम क्या हैं, भगवान जीमूतवाहन की कथा क्या है और पारण किस समय करना चाहिए, तो यह लेख आपके लिए पूरी जानकारी लेकर आया है।
वर्ष 2026 में जितिया व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। इससे एक दिन पहले 2 अक्टूबर को नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाएगी। व्रत का पारण अगले दिन, यानी 4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद स्थानीय पंचांग में बताए गए शुभ समय पर किया जाएगा।
हर वर्ष की तरह इस बार भी बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र में यह पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाए जाने की संभावना है। मंदिरों और नदी घाटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिल सकती है।
जितिया व्रत का वास्तविक नाम जीवित्पुत्रिका व्रत है। “जीवित” का अर्थ है जीवन और “पुत्रिका” का संबंध संतान से है। अर्थात यह ऐसा व्रत है जो संतान के मंगल और दीर्घायु के लिए रखा जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा करने से बच्चों पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। यही कारण है कि सदियों से माताएं इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाती आ रही हैं।
अगर आपने कभी मिथिला में जितिया का पर्व देखा है, तो आपको पता होगा कि यह केवल पूजा तक सीमित नहीं रहता। गांवों में सुबह से ही महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर पूजा की तैयारी करती हैं। कई स्थानों पर लोकगीत गाए जाते हैं, जिनमें मां और संतान के प्रेम का सुंदर वर्णन मिलता है।
दरभंगा, मधुबनी और सीतामढ़ी जैसे जिलों में यह पर्व पीढ़ियों से उसी परंपरा के साथ मनाया जा रहा है। नई पीढ़ी भी अपनी माताओं और दादी-नानी से इस व्रत की विधि सीखती है। यही वजह है कि जितिया आज भी मिथिला की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
ध्यान दें: अपने शहर के अनुसार पंचांग में पारण का समय अवश्य देखें।
जितिया व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन महिलाएं सुबह स्नान कर घर की साफ-सफाई करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। माना जाता है कि इस दिन शरीर और मन दोनों की शुद्धि आवश्यक होती है।
मिथिला में कई परिवारों में इस दिन विशेष पारंपरिक भोजन बनाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ भोजन करते हैं और अगले दिन के निर्जला व्रत की तैयारी करते हैं।
पूजा शुरू करने से पहले सभी आवश्यक सामग्री एक स्थान पर रख लें।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
घर के मंदिर या साफ स्थान पर भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
घी का दीपक जलाकर भगवान का स्मरण करें।
रोली, अक्षत, फूल, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
पूजा के दौरान अपने बच्चों के सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना करें।
पूरे दिन और रात तक अन्न और जल का त्याग करें।
Jitiya Vrat 2026 Puja Vidhi
आमतौर पर यह व्रत विवाहित महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु के लिए करती हैं। हालांकि कई स्थानों पर संतान की इच्छा रखने वाली महिलाएं भी श्रद्धा के साथ यह व्रत रखती हैं।
यह धार्मिक आस्था से जुड़ा व्रत है, इसलिए इसमें किसी प्रकार का सरकारी नियम या दस्तावेज़ आवश्यक नहीं होता।
जितिया व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भगवान जीमूतवाहन की कथा मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जीमूतवाहन एक ऐसे राजा थे जो दया, त्याग और धर्म के लिए प्रसिद्ध थे। वे केवल अपने राज्य की प्रजा का ही नहीं, बल्कि हर जीव के दुख को अपना दुख मानते थे।
कहा जाता है कि एक दिन वन में भ्रमण करते समय उन्होंने एक वृद्ध नाग माता को रोते हुए देखा। जब उन्होंने उसके दुख का कारण पूछा, तो नाग माता ने बताया कि गरुड़ प्रतिदिन एक नाग को अपना आहार बनाते हैं और आज उसके इकलौते पुत्र की बारी है। बेटे को खोने का दुख सहन न कर पाने के कारण वह विलाप कर रही थी।
नाग माता की पीड़ा देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के निर्णय लिया कि वे स्वयं नाग के स्थान पर गरुड़ के सामने जाएंगे, ताकि उस माता का पुत्र जीवित रह सके। नाग माता ने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन उन्होंने कहा कि यदि किसी के जीवन की रक्षा के लिए अपना जीवन देना पड़े, तो इससे बड़ा धर्म कोई नहीं।
जब गरुड़ आए तो उन्होंने जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने पंजों में उठा लिया। कुछ ही क्षणों बाद उन्हें यह ज्ञात हुआ कि यह कोई साधारण नाग नहीं, बल्कि एक महान राजा हैं जिन्होंने एक अनजान माता के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान के लिए प्रस्तुत कर दिया।
राजा के इस अद्भुत त्याग से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने न केवल जीमूतवाहन को सुरक्षित छोड़ दिया, बल्कि भविष्य में निर्दोष नागों का वध न करने का भी वचन दिया। देवताओं ने भी जीमूतवाहन की करुणा और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
इसी घटना के बाद से भगवान जीमूतवाहन को संतान की रक्षा और दीर्घायु के प्रतीक के रूप में पूजा जाने लगा। यही कारण है कि जितिया व्रत के दिन माताएं उनकी कथा सुनती हैं और अपनी संतान के सुखद, सुरक्षित और सफल जीवन की प्रार्थना करती हैं।
मिथिला में जितिया केवल एक व्रत नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सुपौल, सहरसा और आसपास के गांवों में इस पर्व का विशेष उत्साह देखने को मिलता है।
सुबह से महिलाएं नए वस्त्र पहनकर पूजा की तैयारी करती हैं। कई स्थानों पर पारंपरिक जितिया गीत गाए जाते हैं, जिनमें मां की ममता, संतान के प्रति प्रेम और भगवान जीमूतवाहन की महिमा का वर्णन होता है।
गांवों में महिलाएं समूह बनाकर कथा सुनती हैं और एक-दूसरे को व्रत की शुभकामनाएं देती हैं। यही परंपरा इस पर्व को केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाती है।
निर्जला व्रत पूरा होने के बाद अगले दिन पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सही समय पर पारण करना व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पारण की विधि:
स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण का समय अवश्य देखना चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत से अनेक शुभ फल प्राप्त होते हैं।
यदि आप पहली बार यह व्रत रख रही हैं, तो कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें।
यह कोई सरकारी योजना नहीं है, इसलिए इसमें किसी प्रकार की पात्रता निर्धारित नहीं है।
आमतौर पर यह व्रत—
चूंकि यह धार्मिक व्रत है, इसलिए किसी प्रकार के दस्तावेज़ की आवश्यकता नहीं होती।
वर्ष 2026 में जितिया व्रत 3 अक्टूबर (शनिवार) को मनाया जाएगा।
यह व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है।
हाँ, अधिकांश परंपराओं में यह निर्जला व्रत माना जाता है।
जितिया व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है।
कई क्षेत्रों में संतान प्राप्ति की कामना करने वाली महिलाएं भी श्रद्धा के साथ यह व्रत रखती हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार इसमें भिन्नता हो सकती है।
जितिया व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां के प्रेम, त्याग और विश्वास का जीवंत प्रतीक है। मिथिला की धरती पर यह पर्व आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है, जैसा वर्षों पहले मनाया जाता था। बदलते समय के बावजूद इसकी परंपराएं आज भी लोगों को अपनी संस्कृति और परिवार से जोड़कर रखती हैं।
यदि आप वर्ष 2026 में जितिया व्रत रखने जा रही हैं, तो पूजा की तैयारी पहले से कर लें, स्थानीय पंचांग के अनुसार व्रत और पारण का समय देखें तथा पूरे विधि-विधान के साथ भगवान जीमूतवाहन की आराधना करें। ऐसी मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत संतान के सुखद, स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना का प्रतीक बनता है।
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