पूजा से पहले कुछ तैयारियाँ आवश्यक होती हैं:
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मिट्टी या गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत
फूल-माला
दीपक (घी या सरसों का तेल)
धूप, कपूर
पंचामृत
शुद्ध जल
रोली, कुमकुम
अक्षत
तुलसी दल
नैवेद्य / भोग
खीर, पूड़ी, सब्जी
मिठाइयाँ
पान, सुपारी
शक्कर
चौकी
लाल/पीला कपड़ा
गाय के लिए हरा चारा
गोबर के दीपक
अगरबत्ती
मौली (कलावा)
यह सबसे महत्वपूर्ण सेक्शन है।
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सुबह स्नान कर घर और पूजा स्थल साफ करें।
पूजा के लिए पूर्व दिशा की ओर मुख रखें।
गोवर्धन पूजा की असली पहचान गोबर से बनाया गया पर्वत है।
✔ एक बड़े स्थान पर गोबर से छोटा पहाड़ बनाएं
✔ उसमें
गाय,
बछड़ा,
नाग
वृक्ष
तालाब
गोप-गोपियां
की आकृतियाँ बनाएं।
✔ गोवर्धन पर पानी छिड़कें
✔ फूल और रोली से सजाएँ
श्रीकृष्ण की मूर्ति या फोटो को थाली में रखकर पूजा स्थल पर बैठाएँ।
✔ धूप करें
✔ जल अर्पित करें
✔ पंचामृत से अभिषेक करें
✔ तिलक लगाएं
यदि घर में गाय हैं तो—
✔ गाय को स्नान कराएँ
✔ उसके सींग-पूँछ पर हल्दी-कुमकुम लगाएँ
✔ माला पहनाएँ
✔ घास या गुड़ खिलाएँ
यदि गाय घर में नहीं है, तो तस्वीर पर पूजा कर सकते हैं।
परिक्रमा इस पूजा का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कम से कम 7 बार
सामान्यतः 108 बार भी की जाती है
हर परिक्रमा में “श्री गोवर्धन महाराज की जय” बोलना चाहिए
इस दिन 56 भोग का महत्व है।
लेकिन आपके घर में उपलब्ध भोजन से भी अन्नकूट बनाया जा सकता है।
✔ खीर
✔ पनीर/सब्जी
✔ पूरी
✔ दाल
✔ चावल
✔ कचौड़ी
✔ मिठाई
✔ फल
भोग को गोवर्धन पर्वत के सामने रखें।
“गोवर्धनधराय नमः”
“श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी”
“जय कन्हैया लाल की, जय कन्हैया लाल की”
पूजा के बाद सभी सदस्य मिलकर प्रसाद ग्रहण करें और आशीर्वाद लें।
शाम के समय पूजा नहीं करें
गोबर पर्वत को पैर न लगाएँ
अशुद्ध अवस्था में पूजा न करें
मांस-मदिरा का सेवन न करें
झगड़ा, शोर-गुल न करें
एक बार इंद्र देव के अहंकार के कारण ब्रजवासियों पर भारी वर्षा हुई।
लोग डर गए और श्रीकृष्ण से सहायता मांगी।
कृष्ण ने सभी को गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण दी और 7 दिन तक पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाए रखा।
इंद्र देव का अभिमान टूटा और ब्रजवासियों की रक्षा हुई।
उसी दिन को गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है।
✔ घर में समृद्धि आती है
✔ गौ-धन की वृद्धि होती है
✔ परिवार में कलह खत्म होती है
✔ रोग-दोष दूर होते हैं
✔ भाग्य और धन की वृद्धि होती है
✔ घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है
गोवर्धन पूजा सिर्फ धार्मिक रीति-रिवाज नहीं है बल्कि यह प्रकृति, गाय-धन, भगवान कृष्ण और संरक्षण का संदेश देने वाला उत्सव है।
अगर इसे सही विधि और भक्ति के साथ किया जाए तो यह जीवन में समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा भर देता है।
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