छठ पूजा: सूर्य उपासना का सबसे पवित्र व्रत | इतिहास, महत्व और 4 दिनों की पूरी विधि

छठ पूजा: सूर्य उपासना का सबसे पवित्र व्रत | इतिहास, महत्व और 4 दिनों की पूरी विधि

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छठ पूजा: आस्था, विज्ञान और संस्कृति का अद्भुत संगम | पूरी जानकारी

भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं में छठ पूजा एक ऐसी अद्भुत और अनोखी पूजा है जो न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक रूप से भी अत्यंत मूल्यवान मानी जाती है। विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में यह त्योहार सबसे अधिक भव्यता के साथ मनाया जाता है।

छठ पूजा को सूर्य उपासना का महान पर्व कहा जाता है, जहाँ भक्त चार दिनों तक कठोर नियमों का पालन करते हुए सूर्य देव और छठी मइया की आराधना करते हैं। इस पर्व में दिखने वाली पवित्रता, अनुशासन, तपस्या और त्याग इसे दुनिया के सबसे अनोखे और वैज्ञानिक पर्वों में शामिल करती है।

आइए छठ पूजा का इतिहास, महत्व, विधि, कथा और कारणों को विस्तार से समझें।


छठ पूजा क्या है?

छठ पूजा सूर्य देव और छठी मइया की आराधना का पर्व है।
• यह नदी, तालाब, सरोवर या किसी भी प्राकृतिक जलाशय के किनारे मनाया जाता है।
• इस पूजा में व्रती (जो व्रत करती है) तीन दिनों तक बिना पानी पिए उपवास करती है।
• सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है – पहले डूबते सूर्य को और फिर उगते सूर्य को।

छठ पूजा मानव शरीर, प्रकृति और सूर्य ऊर्जा के बीच एक अद्भुत संतुलन स्थापित करती है।


छठ पूजा को छठ क्यों कहते हैं?

यह पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। हिन्दू पंचांग में षष्ठी का अर्थ ही “छठी” होता है, इसी कारण इस पूजा का नाम छठ पड़ा।
दूसरा कारण—छठी मइया, जिन्हें कात्यायनी देवी का रूप माना गया है।


छठ पूजा का इतिहास

छठ पूजा हजारों वर्षों पुराना पर्व है। इसका उल्लेख कई ग्रंथों और लोककथाओं में मिलता है।

✔ 1. वेदों में सूर्य उपासना

ऋग्वेद में सूर्य देव के मंत्र ‘गायत्री मंत्र’ का उल्लेख है, जो इसी ऊर्जा का संकेत देता है।

✔ 2. महाभारत काल

कथा के अनुसार, पांडवों के वनवास के दौरान द्रौपदी ने छठी मइया की पूजा की थी, जिससे पांडवों को कठिनाइयों से मुक्ति मिली।

✔ 3. रामायण काल

सीता माता ने भी अयोध्या लौटने के बाद सूर्य देव की आराधना की थी।

✔ 4. लोककथाएँ

कई लोकमान्यताओं में कहा गया है कि यह पूजा मूल रूप से नदी किनारे रहने वाली महिलाएँ प्राकृतिक उर्जा और सूर्य से स्वास्थ्य पाने हेतु करती थीं।

इन सभी कारणों से यह पूजा हजारों वर्षों से चली आ रही है।


छठ पूजा कब से मनाई जाती है?

ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि छठ पूजा भारत में ब्राह्मणों ,क्षत्रियों और जनजातीय समुदायों द्वारा कम से कम 5,000 वर्षों से मनाई जा रही है।
बिहार और मिथिला क्षेत्र में तो यह प्रथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी लगभग हर घर में रही है।


छठ पूजा क्यों मनाते हैं?

✔ 1. सूर्य देव को ऊर्जा का स्रोत मानकर

सूर्य जीवन का आधार है—
• यह प्रकाश देता है
• फसलें उगाता है
• रोगों को दूर करता है
• मन और शरीर को शक्ति देता है

✔ 2. छठी मइया को संतान, स्वास्थ्य और परिवार की देवी माना जाता है

व्रती संतान सुख, परिवार की रक्षा और घर की समृद्धि की प्रार्थना करती है।

✔ 3. ऋतु परिवर्तन का पर्व

कार्तिक महीने में मौसम बदलता है—गर्मी से ठंड की ओर।
छठ पूजा शरीर को नई ऊर्जा और प्रतिरोधक क्षमता देती है।

✔ 4. मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करने के लिए

चार दिनों की पूजा व्रती के भीतर अनुशासन, शुद्धि और तपस्या पैदा करती है।


छठ पूजा के चार दिन – पूरा विधान

छठ पूजा चार दिनों तक मनाई जाती है, जिसमें प्रत्येक दिन का अपना विशेष महत्व होता है।


📌 1. पहला दिन – नहाय–खाय

इस दिन व्रती शुद्ध नदी या तालाब में स्नान करती है और घर में पूरी पवित्रता के साथ भोजन बनाती है।
लोकी, दाल भात और चने का भोजन किया जाता है।

यह दिन शरीर की शुद्धि का प्रतीक है।


📌 2. दूसरा दिन – खरना

यह दिन छठ पूजा का सबसे पवित्र दिन माना जाता है।
इस दिन व्रती पूरा दिन निर्जला व्रत रखती है और शाम को दूध, गुड़ और चावल से बना खीर बनाती है।
खीर के साथ रोटी और गन्ने के रस से बनी खीर भी बनाई जाती है।

खरना के बाद व्रती अगले 36 घंटे जल भी नहीं पीती!


📌 3. तीसरा दिन – संझा अर्घ्य (डूबते सूर्य को अर्घ्य)

यह दिन सबसे भव्य होता है।
सभी व्रती जलाशय की ओर जाते हैं, जहाँ—

✔ बाँस की सूप
✔ फल
✔ ठेकुआ
✔ नारियल
✔ गन्ना
✔ दीप
✔ कुम्हड़ा (कद्दू)

सब मिलाकर सूर्य देव को पहला अर्घ्य दिया जाता है।
यह अर्घ्य डूबते सूर्य को दिया जाता है, जो जीवन के संघर्षों में भी ऊर्जा का प्रतीक है।


📌 4. चौथा दिन – भोरका अर्घ्य (उगते सूर्य को अर्घ्य)

छठ पूजा का अंतिम और सबसे दिव्य क्षण।
व्रती उगते सूर्य का इंतजार करती है और जैसे ही सूर्य निकलता है—
उन्हें दूध और गंगाजल मिश्रित जल अर्पित किया जाता है।

इस अर्घ्य में—

• परिवार की सुख-समृद्धि
• संतान की दीर्घायु
• स्वास्थ्य
• मनोकामना

की प्रार्थना की जाती है।

अर्घ्य के बाद व्रती परना करती है और व्रत समाप्त होता है।


छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्व

छठ पूजा दुनिया का सबसे वैज्ञानिक त्योहार माना जाता है।

🔹 1. सूर्य ऊर्जा का सीधा उपयोग

अर्घ्य के समय शरीर में विटामिन–D का निर्माण बढ़ता है।

🔹 2. जल में खड़े होने से शरीर डिटॉक्स होता है

जल शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को संतुलित करता है।

🔹 3. उपवास से शरीर की शुद्धि

36 घंटे उपवास शरीर को गहरी सफाई देता है।

🔹 4. माँ–प्रकृति से जुड़ाव

फल, मिट्टी के दीपक, गन्ना, ठेकुआ—सब प्राकृतिक चीज़ें होती हैं।


छठ पूजा के मुख्य प्रसाद

✔ ठेकुआ
✔ कद्दू–भात
✔ दुध-चावल
✔ गन्ना
✔ नारियल
✔ केला
✔ लड्डू

ये सभी प्रसाद पवित्रता और शुद्धता के प्रतीक हैं।


छठ पूजा की विशेषताएँ

✔ बिना मूर्ति पूजा

सिर्फ सूर्य और प्रकृति की पूजा—यह अनोखी बात है।

✔ पवित्रता और अनुशासन

छठ को दुनिया की सबसे कठिन पूजा कहा जाता है।

✔ सामाजिक समरसता

जाति–धर्म–वर्ग का भेद मिट जाता है।

✔ महिलाओं और परिवार की शक्ति का सम्मान

व्रती परिवार की सुख-समृद्धि के लिए तपस्या करती है।


बिहार में छठ पूजा का विशेष महत्व

बिहार में छठ पूजा सिर्फ त्योहार नहीं बल्कि “भावना” है।
लोग चाहे जहाँ हों—दिल्ली, मुंबई या विदेश—छठ के लिए अपने गाँव लौट जाते हैं।


निष्कर्ष

छठ पूजा एक ऐसा अनोखा पर्व है जिसमें—

• सूर्य उपासना

• छठी मइया का आशीर्वाद

• प्रकृति सम्मान

• शरीर की शुद्धि

• मन की पवित्रता

• परिवार की एकजुटता

सभी एक साथ आते हैं।

यह त्योहार बताता है कि—

जहाँ आस्था और अनुशासन हो, वहाँ दिव्यता स्वतः उतरती है।

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